प्रमुख देशों की शासन ग्णालियाँ

प्रावकृथन

राष्ट्र भाषा के पद पर आसीन होने ऊे उपरान्त हिन्दी साहित्य मे एक नवीन युग का आयिर्भात हो रद्दा है। हिन्दी का महत्व पत्येर क्षेत्र में उत्तरोत्तर बढने के साथ ही हिन्दी भाषा भाषियों और हिन्दी के हित चिन्तकों पर नित नयी जिम्मेदारिया आता जा रही हैं। वास्तय में हिन्दी का भिष्य और उसकी मान मर्याटा के मूल्याक्न इन जिम्मेदारियों झे भली भाति पूरे होने पर द्वी निर्भर है। विभिन्न पिषयों पर हिन्दी साहित्य में आधुनिक हपष्टिकोण का समायेश करने का भार वहुत छुछ हमारे विश्व विद्यालयों पर है। विश्व ग्रिद्यालय बोदड्धिक विकास के केन्द्र माने गये हैं श्र वहीं से समात्र को ऊला ओर विज्ञान के क्षेत्र से प्रेरणा भ्राप्त होती है। अब तक मारे विश्व विद्यालयों मे अपने हृदय के भाव अपनी भाषा प्रकट करने की शिक्षा नहीं दी ज्ञाती रद्दी है। हमारे मानसिक विकास पर इसका अत्यन्त घातक प्रभाव पडा है। विद्यार्थियों और अध्यापफा का अधिकाश समय तो अपने विचारों को अग्रेजी सुन्दरतापूृवन व्यक्त करने की कला को सीखने ही ख्रप जाता हद और उन्हे स्मतन्त ओर स्थाभाविक रूप से विचार करने का अतक्राश ही नहीं मिल पाता इस तथ्य को विश्व विद्यालय कमीशन ने भी अपनी रिपोर्ट में स्तीकार फिया है। इस प्रकार की शिवा से जो कुछ ज्ञान वृद्धि हुई भी है, उसका शताश लाभ भी सर्वे साबारण को नहीं मिल सका है। खेती सरीसे विषयों पर ब्ृहत्‌ प्रन्थ अग्रेजी प्रकाशित किये जा रहे हूं, पर-तु उनका उपयोग जनता के लिये कुछ भी नहीं है। किन्तु अब इस मूल को सुधारने के लिये व्यापक प्रयत्न किये जा रहे हैं। कई विश्व विद्यालयों ने मा& भाषा द्वारा हा ज्ञानलान का सकल्‍प करके इस सुधार-मार्ग को और भो प्रशस्त यना दिया है।

विश्व विद्यालयों द्वारा हिन्दी को शिश्ना के माध्यम रूप सम स्वीकार कर लेने से एक नितान्त नयी दिशा काय करने की आवश्यऊता उत्पन्न हो गई है | अभी तक हमारा हिन्दी जगत समा शास्त्र, अथशास्त्र, राजनोीतिशास्तर, रसायनशास्त, भौतिक्शास्त्र आटि विविध विपयो के सम्पन्ध में अत्यन्त अविकसित हैँ) हिनन्‍्ती में इन विषयों पर जो पुस्तकें हैं भी, थे मुययत अन्य मापाओं की प्रति छाया सात दी हैं। इन पर हिन्दी आधुनिक जिचारधाराआ को लेकर

(६ के 2

44

लिए पुस्तरें तो नहीं के बराबर ही लिपी गई दूँ। निश्मदेद्द दिन्दी ख्रमुयादी का अपना एक स्थान | और उनझी उपादियता भी संशय परे ६ै। ऊाइरणार्थ बंगला, मराठी, शुबराती, शरद्वरेजी और से अनुवादित फयिताओं, फहानिया और उपन्यासों गे धिन्‍्दी साहित्य में नप्रीन लेसन शैलिया तथा विचार चाराश्यों को जन्म दिया है सिन्‍्तु अनुयादित साद्िित्य शक प्रकार से मागी हुई बस्तु होती ६, उसम जाति की अ्रवृदि दृष्टिगोचर नहीं द्ोती। बह तो पर-तानि थी मायना था कीर शापाक्षाओं वो श्मिव्यक्ति का साधन मात्र होता है। बोई भी भाषा इस प्रवार के भागे हुये सादिित्य से परितुष्ट शरीर गौरयमयी नहीं हो समती। यद्द तो तभी सम्मय दे, जय फि लेगफगण मीलिए रूप से हिन्दी में मनन करें और दिन्दी में ही लिसे, विचारों तथा लेसनी में ओतन और स्वाभाविकता भी तभी सइतो है

इस समय रिश्व विद्यालयों में अद्नरेनी में प्राठ्य पुस्तकों का स्थान लेने के लिये उन्च कोटि की छ्विन्दी को पुस्तमों की श्रत्याधिक आवश्यकता है। मौलिक पुस्तकों का श्रभाव होने के फारण, आरम्भ में हमें अनुयादों का ही सहारा लेना द्ोगा। स्पतन्त साहित्य की रयना का घुग सम्भगत अलनुयादन्युग के वाद द्वी आयेगा इस सम्बन्ध में बहुत से अग्रेवीदा मद्दाजुभाय माठ-भापा द्वारा राष्ट्र-्सेवा करन के लिये इस च्षेय में उतर पडे है। थद्द छद्विंदी या सौभाग्य दी दे। इनकी जितनी प्रशाप्ता की जाय थोडो द्वे। परन्तु उन्‍हें वियार्थी जीवन में द्विन्ती फी अच्छी शिक्षा मिलने क्ले कारण, थे अपनी भापा में अपने विचार और भाज प्रकट करने की शक्ति भली भाति विश्सित नहीं कर सके है ये मूल के शब्दो और शब्दार्थों पर द्वी समसे अधिक ध्यान रखते हैं, भायाथे पनवी दृष्टि के सामने हाय आने दी नहीं पाते | उनकी कृतियों से शद तो दिन्दी--वे मी कमी कभी 'अशुद्ध ओर हिन्दी होते हैं, किन्तु धाक्य विन्यास, लेपन शैली ओर झुहावरे प्राय अज्जरेयरो से उधार लिये होते हूँ। डा० अपमोहन शर्मा की भस्तुत पुस्तक भी इसी प्रकार का एक प्रयास है। उन्होंने इस समय प्रमुख देशों की शासन श्रणालियों पर योग्यतापूर्श पुस्तक लिख हिन्दी और विशेषकर विश्व यिद्यालयों के छात्रों को बडी सेवा की दै। इस समय दसारा देश एक लोवतस्प्राव्मक युग से पदापेश कर रहा दे | हमें अपने नयनिर्मित विधान को सफ्ल वमाने झे लिये

जैह 27 4 2.

शत

( खो)

समस्त देशवाततियों में लोकसंत्रात्मक शासन-प्रणाली के प्रति आस्था ओर श्रद्धा का भाष जाप्रत करना द्ोगा देश में इस प्रकार का यातावरण उत्पन्न करने के लिये काफी समय तक थैयेपूर्वेक्त कठिन परिश्रम करने की आवश्यकता है। मेरा विचार है, संसार के अ्रन्‍्य पमुख देशों की शासन प्रणालियों का इतिहास ओर कार्य-कल्लाप का अध्ययन, इस सम्बन्ध में अत्यन्त फलदायक होगा। इसके द्वारा इमें यह भी ज्ञात दो ज़ायगा कि जिन परम्पराश्मों को हम भारत में « स्थापित करने का प्रयत्न कर रहे हैं, उन्हें अन्य देशवासी अपने देशों में किस प्रकार स्थापित कर सके हैं। डा० शर्मा की यह पुस्तक सर्बेसाधारण और विशेषकर विद्यार्थियों तथा उन लोगों के हिये, जिन्हें अन्य भाषाओं का ज्ञान नहीं है अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगी इस सम्बन्ध में उनका प्रयास प्रशंसनीय ओर अनुकरणीय है पुस्तक के प्रारम्भ में प्रथभ तीन अध्यायों में 'बेधानिक सरकार, 'संत्र शासन का सिद्धान्त' तथा 'सरकार के भ्वरूप ओर कत्तेव्य' का निरूपण कर देने से पुस्तक की उपयोगिता और भी वढ़ गई है। यदि डाक्टर साहब ने स्थान-स्थान पर अन्य देशों के विधानों का भारत के नवीन विधान के साथ तुलनात्मक विश्लेषण कर दिया होता, तो मिस्संदेह सोने में सुगन्‍्ध जाती पुस्तक की भाषा पर अंग्रेजी की छाया स्पष्ट दे। भापा कहीं कहीं शुट्टल दो गई दै और उसमें प्रवाह की भी कमी है अंग्रेजी के पारिभाषिक शब्दों में चहुत से पर्याय भारतीय विधान परिपद्‌ द्वारा स्वीकृत पयोयों से भिन्न है और कुछ स्थलों पर अंग्रेजी के एक ही शब्द के लिये कई पर्याय अनिश्चित रूप से श्रयोग क्ये गये हैं पाठकों और विशेषकर विद्यार्थियों को इससे किंचित असुविधा होना स्वाभाविक ही है, परन्तु हिन्दी के पर्याय के साथ कोष्टक में अंग्रेजी का पारिभाषिक शब्द दे देने के कारण, आशा है, यह कठिनाई काफी कम हो जायगी। हिन्दी जगत में इस समय ऐसी पुस्तकों की अत्यधिक कमी है मुझ्ते विश्वास है, डा० शर्मा की यह पुस्तक इस कमी को पूरा करने में सहायक होगी और साथ हो अन्य लेखकों तथा अध्यापकों को इस प्रकार की पुस्तऊँ लिखने की सदू प्रेरणा प्रदान करेगी।

लखनऊ, हर गुप्त २६ अग्रैल, १६४० ७) +अभाड उ्त

दो शब्द “६६9५8: ++

गत तीन वर्षों में भारत में क्रान्तिकारी परिवततन हुए है, विशेषतया राजनीतिर क्षेत्र में इनका प्रभाव भारतीयों के जीवन के प्रत्यक पहलू पर पड़ा है! साहित्यिक क्षेत्र में भो जो ज्ञाम्ति ओर उन्नति हो रही है उससे श्राशा की जा सझती है कि भारतीय भाषाओं में और विशेषतया हिन्दी भाषा में, जो राष्ट्रीय भाषा मान ली गई दै, साहित्य के प्रत्येक अन्न पर नित नयी पुर प्रकाशित होंगी। जैसा फि माननीय चन्द्रभानु मुप्त ने फ्रावक़थन में कह्दा है, विश्वविद्यालय के अध्यापकों का यह कत्तव्य है (ओर में तो इसे उनका धर्म दी फहुंगा) कि वे द्विन्दी में उन विपयों पर पुस्तकें लिखे जो विश्वविद्यालय में पाठविधि के द्वी लिए उपयोगी सिद्ध दों, वरन्‌ जनसाधारण में भी ज्ञानवृद्धि करने मे सहायऊ हो

हिन्दी भाषा में राजनीति विपयपर अभी तक अधिक नहीं लिखा गया है। विश्वविद्यालय में राजशास्त्र का अध्यापक होने को दैसियत से मैंने अपना यह कर्त्तव्य समम्का >#े में अपनी शक्ति का कुछ भाग हिन्दी साहित्य की सेवा में लगा दूँ इसी कारण मेंने संसार के प्रमुख देशों की शासन प्रणालियोँ' लिखने का उद्योग किया। इसमें सन्देह नहीं कि आरम्भ में ऐसी पुस्तके' लिसने मे अनेक कठिनाइयाँ होंगी और इसी कारण पुस्तकों में त्रुटियाँ रह जाना भी आश्चये की बात नहीं हिन्दी में पारिभाषिक शब्दों का उस समय तक अभाष ही था जिस समय यह पुस्तक लिग्यी गई है। भारतीय भाषाओं के विशेषज्ञों ने छिन्दी पर्यायों को लिस समय निश्चित्‌ रूप से स्वीकार किया था उसके पूर्व ही यह पुस्तक तीन-चौथाई से अधिक मुद्रित हो चुको थी उन पर्यायों के स्थान पर मैंने उन्हीं प्रारिमार्षिक

(“5 -

शदी का प्रयोग जिया जो सावारण्तया प्रचलित ये श्ययया पाठक थी समझ में था सकते थे, अगते सहारंणों में सर्ममान्य पर्यायों पा ही प्रयोग होगा पुस्तक की श्न्‍्य जूटियों को भी दूर फरते पा में श्रयत्न कहगा। जो सम्तनन इस कराये में मुझे जुटियों बतावर अवता अपनी बहुमूल्य सम्मति देकर सहायता देंगे उसका में आमभांरी हैंगा

मैं माननीय घन्द्रभानु जी गुप्त यो फ्शिषतया धन्यराद टेंता हैँ. फि उन्होंने अपने पहुमूल्य समय को देकर पुस्तक को पढ़ा ओर प्रावक्वन लिया। में उन्हें आश्वासन देता हैं कि अगले सरकरश में

मैं पुस्तक फी यरुटियों को दूर करने का प्रयाम करू गा

राजशास्न विभाग, | लख॑नंक पिश्वत्रिधाज्ञय, ब्रतमोहन घर्मा

मद स् १६४५० +

(5 समपरा :

हिन्दी के परम-प्रेमी तथा उच्च-शिक्षा के समर्थक हे राजनीवि के प्रक्राएड विद्वान्‌ माननीय श्री चन्द्रभानु मु मंत्री पे उत्तर प्रदेश सरकार

2

का सादर समर्पित !

-+व्जमोहन' शर्मा

अध्याय... विषय

विपय - सूची

व्र्छ

१. वैधानिक सरकार |

राज्य समान का सबसे उन्नत रूप है - राज्य का पेतिदासिक श्राधार-- संविधान द्वी सामाजिक संगठन की रूप-रेखा का च्योतक है-- संविधान को परिभाषा--संधिधान फो दावश्यकता--संविधान का इतिहास--द गलेंद में संविधान का विकास -अमरीझा में - यूरोप में- दूसरे स्थानों में-- संविधानों, का घर्गीरुरण -- लिखित विधान फेवल्ल एक दांचा है -- परम क्लिप्टता झवांच्छुनीय हैे-- विधान पर छोक-नियन्त्रण-येघानिक सरकार की परिभाषा--सॉवधान निर्माण फे विविध प्रकार--संदेधानिक और स्वेच्छाचारी शासन शैल्ली में भेद--

संघ शासन का सिद्धान्त श्र

छः राजनैतिक संघ के प्रकार () व्यक्तिगत संघ--(२) चास्तविक संघ :- 4३) समूह शासन यथा अस्थायों संघ--(४) संघ शासन--संघ शासन को परिभाषा-संघ किस प्रकार बनते हैं--संव शासन को विशेषतायें -- दो सरकारों का साथ साथ रदना- शासन अधिकारों का विभाजन-- अवशिष्ट, समपर्ती और निद्दित शक्तिया--अवशिष्ट शक्तियां (86९४ 008७४ए 9095०78)--समवर्ती शक्तियाँ (009007ए६॥6 90०9७१४)-निद्वित शक्तियों का सिद्धांत, ( [79]600 0०0 एछ७१8 )-- (क) दो सरकारों की नागरिकता +-(ख) लिखित और पिलप्ट सविधान-- (ग) घिशेष प्रकार की स्यायपालिका-- (घ) सम्बन्धोच्छेद का सिद्धान्त -- संघ शासन के अनुकूल हेतु ()) भोगोलिक निकटता-(॥) आर्थिक लाभ -- (7) राजनैतिक हेतु--(पए) जाति सम्बन्धी और सास्कृतिक हेतु--संघ शासन के गुण दोप---आचारय डायसो (2:0०. /006 59) की आलोचना --आंड की आबोचना--आचार्य लास्को (,89]:() की प्रशंशा--संघ शास्तनन का अनुभव क्‍या चतलाता दै--पादय पुस्तके-- सरकार के स्वरूप ओर कृत्या है ष्ट८ सरकार प्रत्येक राज्य का अनिदाय भंग है--आधुनिक राज्यों में सरकार के विभिन्न रूप हैं-प्राचीनकाल में सरकारों का धर्गोकरण--वं्गीकरण के दो झुख्य आधार--सरकार का संख्यात्मक चर्गीफरण- सरकार का

* है के

गुगएसर पर्गीषरण “सरकारों ण्य श्ापुनिस यर्मोकरण--ध्रयक्त तथा अप्र्यव यवशन्ध--मलायन्थ् के सरवन्ध में कतिपय मस-्रवावन्त्र के

/ सिद्ास्त -द्रणतन्ध की सफ़्लता फे लिये चावश्यक परिस्यिनियां-

निरंकुशसा से युद्ध काने से प्रगातस्थ की प्राप्ति--जनतस्ध चौर अधिफओं की घोषणा-पमजातन्त्र और प्रप्म सहायुद्ध-स्वतस्त तथा 'परेतस्थ सरकोरें>»याधीन प्रदे्शा के रपने का झमिप्राय --उशरदायी . अलुराखायी सरवारें--सरकार एफ पेचोदी संगठन इ--सरकार फे सीम अग-मौन्देशक्यू (४000७१त१॥ाा०फए) चौर अधिकार विभाग का सिद्धान्त - विधान संदछ-रिधान मंडल फे भिंशनमभिश्च रूप-द्वियुद्ती पदूति के युण-- दिगुदी पद्धति के दोष -संच-शार्सन थीर दूसत सइन-दोनों शद्दों फी रचना भौर उनके अधिकार -- विधान मण्दलों की विभिन्न निर्वाचन प्रणान्रिया - भ्रमुपाती #तिनिधित्य पदति- मतदाताओं भौर उनके अति- निधियों फा सम्बन्ध--ऊार्यपालिका (5८९७४ ४८)--सरकारों का उनको कोर्थपालिका को वनायट के प्राधार पर धर्गोकरण, स्वेच्धाचारी अध्यक्षात्मक, संपदात्मके-मन्त्रिपरिपद्‌ प्रणाली के सिद्धांस-संधदात्मक या पाणियामेंटरो रामनतन्त्र प्रणाली, .फे गुण --राजबीतिक प्ञ प्रणाज्ो ओर प्रआातन्य राज्य -द्राज्य में सिविद्व सर्विघ-राप्य का ठोसरा अंग न्यायपालिका--न्यायपालिका सत्ता के कार्य-सिद्धान्त--राज्य के कत्तब्य --राज्य के कर्चाव्यों का , वर्गोकरण--राप्य के क्त्त'ब्यों को प्राचीन कढ्पना-- सरकार के कत्तंब्यों को ग्राछुनिफ कल्पना-- पाद्य धुस्तकें--- इब्र्लेड की सरकाग |. ) छ्न्‌ अगरेजी शासन विधान का विकास--हंगलढ में छेप्लो-सेव्सन ज्ञावि -विरेन में साई घमे-+पुलफ्रे औरेर गलड का एक रूप! हो ना +विटेनगेमोर (१४॥४7७४९०४7०४), इसकी बनावट ओर इसके

/ क्रत्तब्य - नोमन (ए०ए89) काह -- इगलेंड की जनता के अधिकारों का माना काटो (38७08 (७79) सन्‌ १९१७ ट०-एक्लीविन घंश के राप्यकाल में गलड का शासन-पिधान -- औऑस्सफोर्ट के उपचन्ध---

- खाडसन डडे सास्टफाड़ द्वारा बेरनों का नेवृत्व--साइमन की १२६४ और ३२६४ को पाकियामेंट--एुडचर्ड प्रथम के शासन सुधार-- सन्‌ १२६०४ ई० की मेड पालियामेंट (529 ?77)&7९70) शतवर्षोय युद्ध ओऔर पालियामेंद--नौसेल एज्लीचिन राजवन्शों के समय -में स्याथ- पालिशय का विज्ाप-गुनाव युद्ध (फऋछा र्ण ह05९9) और शासन विधान सम्बन्धी परिवर्तन - व्यू डर धंशीव निरंहशता की स्थापना--

(दे)

हु स्टु मर काल में शासन परियर्तन >+चारस्स प्रथन झोर पालियामेंट राज- सत्ता की घुनस्‍्येपनों (+६०० ६०)-सत्र १४८८ ई० का प्रांति झोर प्रतिफलित शासन विधान स्म्पन्धों परिवर्तव- बिल आफ राटदुस-दो समनीतिक दलों के। भारम्भ--रूहियादी एवं उदर पक की नोसि-- पैनोवर राज्य एरियार के शासनमगाल में राजनोतिक पत्तों थी परकारें - मम्मिमण्डल प्रणाली (00 0०700६ 598|90) का अन्म-- उप्मीसवों शताब्दी के घेघानिर सुधार --सच््‌ १८३२ के सुधार -सखामा- जिक सुधारों को माय -चार्टिस्ट घानदोलन (200 0॥87790 »0ए९- 72080४)-सन्‌ १४६७ है का द्वितीय सुधार-ऐक्ट-सन्‌ $झ८४ का सुधार * संकट -रोहिस्ट्रीय्यूशन आ्राफ सीट्स ऐक्ट १८८४ (॥ि९ताइ:व)प्र00 0 80008 #0७ ]9885 )--स्थानीय शासन में सुधार --यथीसवी शताब्दी के सुधार--न्याय पद्धति का सुधार - पाठ्य पुस्तकें -- अंगरेजी शासन-प्रिधान के विशेष लक्षण | ११० अड्रेणो शासन-विधान एक लेख्य नहीं-मेग्ना काटी, 809 (8708 : 2]8)-पिरीशन आफ राइट्स (2९६॥707 6 ?8॥4 : 628) दैबियस कौपेस ऐक्ट (स७0९४४ 0079प५ ८५४ - 079)-प्रिल श्राप राइट्स (गज 0 २8068: 089)-दी पेक्ट झाफ संटिलमेंद (7]6 300 6 80॥0[९७०॥६ : )70] )-दी ऐजट दाफ यूनियन (| 6 80०० एगाणा ; 707 )--दी पेक्ट आफ यूनियन विद थ्रायरलेंड (0७ 8०४ एम्रांणा छाथा फ्शेशात ; ॥800 )-दी रिफोर्मंस्‌ पेकर्स ( 08 र€(07ए9७8 8०४७ 832, 807, 3884 &70 ॥885 )-रिप्रेजेस्टेशन आफ दो पीपिल ऐस्ट्स ( छे०ए7९8०४६७४६४०७ ०६ (७ 9९०७९ 3०३ ]9]8 जाते 0928)--ज्ञोकल गपनेंमेंट एक्ट्स ([,0०क ७0एश/घा९070 8०५७ 888; 89$ &0१ ]949)--दी जुडोकेचर ऐक्ट्स ( ॥फ6 बंप्रदाएबॉध76 8०08 56 3873, 875, 7876 800 894) - दो पालियामेंद पेइट ( पश6 फ8शिवक्रा०१6 4०6 974 )-- अलिखिव संविधान -- सविधान का लचोलापन-शासन विधान से स्थावित पालियाप्रेंददी भ्रशावन्‍्त्र-राजनोतिक पक्त प्रणली --अजुदार पत (000- 867४8 ७४० ९०४०)--अनुदार पक्ष और ईसाई धर्म-सघ - अछ्ुदार

पच्च थौर समाज -श्रम पढ़ ([/0०७) 9०709) इंगलेंड मे राजनोतिक पक प्रणाली -- पाद्य घुस्तकें--

. पार्लियामेंट और विधान निर्माण * १२७ हाउस आफ कामन्स-गृह्द को सदस्य रंख्या- कामन्स में अ्रधि-

( )

निधित्द -निर्दोषत हेंद्र निया यश देख-पार्णियारेंट को अवधि-द्वाठस आफ छामन्स फरे सदरस्या का सनोतयन (07॥00॥)--निर्वाचन- जियोगर हे पाज को पोष गा-ब्रहु वर्क मतदानायों का सनाधिझार से घंधित दोना-निवोधन प्रणाली के दोष- निधार सुमाव-एुक्सख संक्रमणीय मनत-मणाज्ी (9॥020 :709१074]0 ४७०६० 8$80677)-विर्रस्प- मीय 'भौर एकर्रीमून मद (पेटडाए00४0 बाते एप्रकाप्रोब्वाए७ ए०(०)-कया हाउस झाफ़ कामन्य थास्तय में सक यर्गो का प्रतिनिधि करता है --सदन फा सयठनत-भष्यप (8]708|:९३) के फर्क्षप्य-सदन की समितियां -- समिर्ठियाँ कैसे नियुक्त की जाती टैं-- सदन में कार्यक्रम के नियम-सदृस्याँ ये कप्तब्य (00॥88६005) थीर विशेषाधिकार (079॥0809)-सद॒न के संत्या रूरी अधिकार-द्वाउस श्राफ़ ज्ाइस- हाउस चाफ का्ट्स मास क्‍यों (-प्रीयर बनाने का राजकौप्र विशेषाधिकार -द्वाउस धब्राफ छाड में कौत कोन लाग होते ई्-लादों के क्तंप्य और विशेषाधिकार -- द्वाठस आफ छोदोस के विशेषाधिकार > खाइस किसका प्रद्धिनिधिरय करते ईैं--ह|टस शफ लादूस फे सुधार-आइस समिति-- सन्‌ १३२६ की यौजनायें - सैलिजवरी की सुधार थोजनायें-द्वाउास आफ़ लाडस का सेगठन--हाउस शाफ लाइस के कर्त्तत्य -न्यायकारी कत्तब्य - पार्लिय मेंट के प्रधिशार-पालियामेंट को सर्वोच्च सत्ता-- सत्र ११११ का पार्लियामेंट ऐक्ट - विधायिनो प्रक्रिया (,088]&- $3४७ (97०0०७१ ७६९)-जिघेषर (&॥॥) और अधिनियम 3०४) में क्या अन्तर दै-विधेयकों के प्रकार-पालियामेंट के पुक साधारण सदृध्य का कार्य--विधेयक का नोटिस--विघेयक का भ्थम पाचन (कपाछा रि०ध०0०8 )--द्वितीय वाचन. ( 860070. पछछम्नत- गाए )--वृवोय दाचन ( एफग़ाऐे 7ै६४0)०8 )- मुद्दा विधेयक के लिये कार्यक्रम - दोनों सदनों का मतभेद किस प्रकार समाप्त क्रिया जाता दै--पादुय पुस्तकें--

कार्यपालिका : राजा और मंत्रिपरिषद्‌

३७० कवां-राज्ण भक्त के किये आयेशजलिका सत्ता दव-दूसरे राध्ट्रपोत्यों की अपेक्षा राजा की आय - घड़ रे वी शजतच नूतन को दृष्टि में और घालव सें--घालव में राजा के अधिकार निश्रत्रित हैं-दाजा और न्याय पशल्ििका --राजा और विधाधिनों झाक्ति--राजा ऋर कार्यपालिका शक्ति-- क्ाउन और छिंग का भेद >भत्रिपरिषद्‌ -फाउन को त्ोन कौसिते-- क्यूरिया का प्रारम्मिक इतिहास-मश्िपरिषद्‌ ( 08ऐम ७६ ) --हैनोरर

( )

राजयंश के समय की कैथिनेट अथोव्‌ सपत्रिपरिघद-ऊपिनेट घर्थात्‌ म॑प्रि- परिपद्‌ को रघना-प्रधानमंत्री-संत्रिपरिषद्‌ का भोतरो संगठन- परिषद्‌ की वैठकों में उपस्थिति-परिपद्‌ में छिन गिपयों पर विचार द्ोता है- परिपद्‌ सचियाज्ञय का फाम-संभ्रिपरिषद्‌ की समितियाँ-अन्तरोय परिषद्‌ ([व007 0४8४70०॥) -युद्ध परिषद्‌-- (१६१६-- १४) -- सन्‌ १६३ की युद्ध परिपर--मम्त्रिपरिषद्‌ और मन्प्रिमएडल सें भेद -- मं प्रिपरिपद्‌ का शासन प्रणाली में स्थान -पाद्प छुस्तकें-- दी व्हाइटहाल (706 १४४४७ स्व)। १६१ बहाइट द्वाल यया है - प्रशासन विभागों के अध्यक्ष -श्रथें विभाग-- (४० ए४४०॥९५४०:)-शूद्ध प्रिभाग-घेंदेशिक प्रिमाग - श्रम विसाग --स्थास्थ्य पिभाग -- इण्डिया थ्राफिस- सिधिल सर्विस्त- पाद घुम्तकें -- अद्वरेज़ी न्यायपालिका ब्ण्ड विधि शासन ( िए8 0 ,8ए9 )--विधि शासन के अपलाद- विधि-शासन से श्रनुमानित नागरिक '्रधिकार--अ्र ग्रेंजी न्यायपालिका के दूसरे घिद्धगत्त--इंगलंड में जूरी (पंच) प्रणालो -- न्यायपालिका फा संक्षिप्त इतिद्वास - पाद्य पुस्तऊँ-- अद्वरेजी स्थानीय शासन | २१४ स्थानीय शासन का प्रयोजन -- अडह्वरेजो स्थानीय शासन का इतिहास-- १६ थो शतानदी में स्थानीय शासन का सुधार--स्थानीय शासन के च्तमान क्षेत्र-रूरल पेरिश (फिप्राणे 28779॥)--रूरल दिस्ट्रिकट (छिपा) )3070.) -- अरब्न डिस्ट्रिक्ट (प/9870 08700) -- काउन्दटी (007709)-नगर बरे (एाफशय 800ए६)- बरो का शासन--कौसिल के श्रधिक्रार--प्रशाप्तन काउन्दी (6 तेशफंड ६छए० 00एागा> )--इगलेंड में स्थानीय शासन संस्थाओं पर केन्द्रीय सियन्‍त्रणश--पालियासेट का निर्यंत्रश--लन्दन फा शासन प्रबन्ध--सिदी आफ खन्‍्दन-काउन्टी आफ लन्दन--लनन्‍्दन काउन्टी कौंसिल के कत्तव्य-लन्दन मैट्रोपोलिटन बरो-- पादय पुस्तकें-- डोमिनियन स्टेटस | श्र ब्रिटिश साम्राज्य--साम्राज्य की स्थापना के आधारभूत रभिप्राय -- समुद्रपार स्थित साम्राज्य से इंगलंड को ज्ञाभम--डरहम की “रिपोर्ट ओर औपनिवेशिक नीति में परिवर्तत--१& थीं शताब्दी के उत्तराध

जि

में औपनिवेशिक नीति--सन्‌ १६१७ का साम्राज्य सम्मेजन-- १६३१ की

(६. ६५ )

दाद गिरग दर यब्या था (झै त(त ०३॥ी कक 90)- इपगियेरों हैं राजा वा रपाप>+-उपरनिर्दे्शा को रोद्ध ॒शा- डपर्टिन पजि् गवार जमा + पोरष धृशस्टके -- !

», पत्ाष्ा पा शासन व्िधा)स ८, म्ट््र शासन दिधांग का इतिद्वाप » खाद डशाइस डी रिपोट +- एियथक दा धस्ताथ दर उप पश्मर सन्‌ ॥८६६० का राख दियान शासन विधान के विद्यास्स-पप सरकार -धार््तों पर पंप सरदार छ। गिर्षंप्रण -> संप विधान संदा!-दथम सदन मे प्रतिनियिय के शियास्त-सोजेट था साादत-ारीनिट के सदम्प पी योग्पतादें-गपरनर सतसख फे सनोनोग सादर्प सीनेद या संगडन चोर उसझी यायें पद्धलि- संघ कार्यप्राल्विका- फार्यपालिया दर राजा --फ्मादा को धियो बौसिल-मम्यिमरस्श्ण दी पाम्सडिम बायवालिर। द्ै-मंद्रिपरियद्र थी धरवट--सिवधिस्त संयिस-- कनाडा यी स्थायपालिंगा-प्रास्तीय सरफारे -- इत री शक्तिपाँ--श्रान्तोी विधान मण्डल -प्राग्तीप अध्यप्त-शासन विधान बा संरोधिन -राजनिविक

छ--रुपक परच-भ्रमिफ एचध-ठंदार प्चझथ अतुद्दार पफ्च-- पादप पुम्तके

३, आस्ट्रेलिया का संघ-शासन ६5४ शासन दिधांन का इतिषास-- विस्तार वे सनसंण्घा-महाद्वीप की छाज

आर उसमें बादर कोगों फा पसता--ध्रास्ट्रं जिया की सस्वायें गले में खाई गई-संघ शावन फे विधार का ऋाग्सम-संघ समिति के फ्रतध्य थे शक्तियां सन्‌ १४०० का शासन विधान--र्रंध-सरकार -- रफ सरसार “की भारियां -- संघ सरकार मरे शाधित थ्देश-सेंर-परफार को आर्थिक आक्तिया--सेंघ विधान सण्दख-सीनेट--झया सीनेट उपराज्य प्रभुता का झोतक दै-- सोनेट में ध्ाकृस्सिक रिक्त स्थानों का मरता- गणप्रकझ ओर मठदान - प्रतिनिधि-सदन-- विधान भगइल की शक्तियां --देनों सदनों के मतमेद सुक्षकाने का उपाय--गवनर जनरल की सम्मधि--संय कार्यपालिका-सन्त्रिपरिपद्‌ू को रचना - संघ न्‍्याय पालिका द्वाईकोर्ट की शक्तियों --सविधान का सशोधन - संदिधान संशोधन फे सम्पन्ध ' में पार्कियामेंट पर भ्तिबन्ध -डउपराब्य और स्थानीय श्यघ--संघ स्थापित दोने से पूर्व उपराज्य स्यतन्त्र श्रे--उपराज्यों को शक्षितियाँ-- गवर्नेर-उपव्राज्यों के विधान मण्दल -उपयाज्यों को विधायिनों शक्ति-- स्याथ संग़्न -- राजनीतिक पर्चध-प्रारम्म में पत्चों का ग्रमाव--पह्ुों फे आधारभूत आर्थिक प्रश्न-- पादय घुस्तकें-- १४, दक्षिण अफ्रीका का संप-शासन। ््ज शासन विधान का इतिदाक्ष--सत्र्‌ ॥8०० सफू-चार स्यावद्धस्थी

( )

उपनिवेश -संघ बनाने के प्रयहन का घ्रारम्भ - सन्‌ १६०३ फो उपनिवेशो फो कार्फ्र'स-- सब ३६०८ फी बास्क्रेस->सन््‌ ३४०६ पा शापन- विधान -शासन-विधान की पिशेपतायें -एक्ास्मझ विशेषताये--संघा- स्मझ विशेषतायें -- मिला जुला शासन विधान -- संघ सरकार -- संध विधान मंडल -- सीने ट-सीनेट फे सदस्यों का निशैचन -- सीनेट के सदस्यों को योग्यवा--सोनेट की कार्यपद्धति--ट्वाउस श्राफ असैस्यक्षी--मताधिकार और सदस्पों फो योग्पतायें-श्रसेम्यली का संगठन पार्लियामेट स्पय॑ आपने नियम बनाती है-दोनों सदनां का पारस्परिक सम्बन्ध-- संघ फक्रायपालिका-संघ न्यायपालिका -प्रान्दोय स्थानीय सरकारें -- शासन-विधान का संशोधन-राजनैतिक पछ -पादुय पुस्तकें --

3३. आयरलैणड श्श्श्‌ संगैघानिक इतिहास-आयरलैंद के रुदेघानिक इतिद्दात के चार युग-- आपरलेंद पर प् गरेनों को प्रिजय-व्यडइर काल--फेंथोजिक प्रोटेस्टेन्ट समप्रदायों फे अम्ुयायियों में कगढ़ा -१८ थीं शताब्दी में-- होम रूल फे लिये रूंघर्ष--सन्‌ १४२२ पा शासन दिधान--कार्य- पालिका- सन्‌ १६३८ का आयर राष्ट्र - संविधान जनता द्वारा हो दी हुई देन--नागरिकों फे अधिकार --आयर राज्य को श्रधि 8९ सीमा--का4- पौलिका रा्याध्यक्ष-नामनिर्देशन फेसे धोता हैं--उस्त पर अ्भियोग कैसे क्षगाया जाता है-- प्रेमी डेंट की शक्तियां--शनतयों पर प्रतिधन्‍्ध-- राज्य परिषद्‌ ( 00५0०) 6/ 86806 )--ऊार्यवालिका--प्रधानमन्त्रो ( 706 7४०३४९७७०) )--विधानमण्डल् -राष्ट्रीय संवद ( ऐप 8व- 004| ए7॥जशछ्य०ात५ )-प्रथमू सइन -द्विरीय सदव-- अ्रधि- नियम फेसे बनता दै- सुद्ांवधेयक--दोनों सदनों फे मतविरोध फो

* दूर करना - प्रेसीडेंट फे हस्तात्र--सविधान का संशोधन--पाद्य पुस्तकें-

१६. संयुक्तराप्य अमेरिका हे इ्बे८ संयुक्त-राज्य अमेरिका का सेघ शासन - शासन विधान का इतिहास - पूर्व - कालीन उपनिवेश - उपनिवेश में समानताग्रें-- ३पनिवेश निवासी श्र गरेमी सस्थायें चाहते थे-मात्भूमि के विरूद्ध युद्ध घोषणा -- यह बास्तविक स्थायी संघ था--फिलाढेलफिया सम्मेलन - १७८७ का श।सन विधान -- विधान सर्वोच्च अधिनियम हे-- शासनविधान की अन्य विशेषतायें--संय सरकार की शक्तियां -- शक्तियों को सीमा स्थिर करवा--सधघ विधान- मण्डल - निर्वाचन क्षेत्र -- मता००८र स्थानीय प्रतिनिधित्य-- प्रश्तनिधियों का पारिश्रम्तिर-- सदन अपना कार्यपद्धत्ति स्वय निधारित स्रता है - सदन के अफसर- सदन को समितियां - व्यवस्थापन कायप्रणालरी - दोनो

(६ )

पदगों. का प्राहपरिष् दिशोप - दूधध सदुग -सौनेट के सदस्पों को चोयवाएें >सोगेट के सदस्पों वो प्राप सुविधायें-समाप्रि-- गोतेद की शालियां >थानेट गदमे शतिशार्वो दृसा सदत एै- सातेट घअदगी यार्यध्रणारों श्यध निधारित बरती द्वे-परद्मिय का प्रभाव -रंप वा्पाजिदा-प्रे साउेस्ट पद फि जिय चोस्वतार्ये-पसीएंट के पद की 'नउधि -विर्वाधन बसे होगा दै+प्रेसोटंद विर्धायकों का चुनाव -प्रें सोटेंट थी। उउन्प्रेसार्दट का निर्वोपनन्शपप--प्रं धो्टेट का घेतन-प्रें सो्ेट चापरत पाषधिव ध्यति दोता है। सचते शानिशासा शासमाष्यतत-- यिधाविनों शक्तिपौ--प्रे साईट क| ध्रतिवेधास्मक पिफार ( ९७४० 7?0एटा) - प्रतिपेघारमक चपिणार ( ४0० 90फ67 ) का सहरध -- वार्यवारियां राकिया+- स्वयियेत्ी शरतियाँ (धटास्वा0्घ6737 6एए७५)--ट्रें सा पेंट पर चमियों ग-प्रे सादेट वी संध्रिपरिषदू- सक्िय प्रोषीरंट फे मानएत दे. सप स्थावप्कतिसा सर्वोच्च स्यायाणव-न्याया-

धोशों थी नियुक्ति-सर्योच्ष स्पायस्तय का अधिकार क्षेश्र--म्रारम्मिक

अधिह्नार-पेत्म -पं॑द्िधान की स्याट्या-- सर्नोच्च न्यायालय की बदावट --

भश्रपणशीक्ष म्यायालय-मिक्षा म्थायाद्य-'्रम्प न्यायाश्रस - शासन

परिधान का संशोधन -सथुकतराउए में रासनैतिक दल -परादूय पुस्तकें -

(५, संयुक्त राज्य अग्ेरिया में उपराज्यों परी सरकारें ३८० छपराज्यों की उध्यक्ति विकोस--उपराज्यों के सम्बन्ध में कुछ प्रमुस यार्ते-->उपराज्य. शाम्यन-विधान >- ४६ उपराग्ध झरगसन-विधान-- उपराज्यों के शाखन विधारनों थी सामान्य पिशेपतायें -ठपराज्य विधान मगदक् - निधानसपइल का निर्माचच-विधानमरदल की अवधि -- इब्यधर्पापक ससढलका काय सावधान सूशोधन-- ठपराज्यों के विधान- अयदल का शक्तियाँ--डपराज्यों को पार्यपराश्चिका-गवर्नर - गयनेर की शाक्तियाँ --दूसरे पदाधिकारी -- उपरात्य न्यायपालिरझा--सुथानीय श्यसन- विभिन्‍न स्थानोय संस्याएँ-प्रग्यक्ष लोकतन्त्र-छधिनियम उपक्म ( व॥7 धंए८)-लोक तिर्णय-अधिनियम प्रदरण लो निर्णेय ( ]#ध8- ५96 छग्े दिटण्श्या१एचछत )--इस प्रणालों के दोष --प्रत्यादश्ण ( ९८७ )--पाद्य घुरतकें -- *

६८, स्पिट्ज़रलेंड की सरकार | ब्६३

शासन-विधान का इतिहाल्चन--परिचय--निवासी -वैधानिक इतिहास के पाँच थुग़-- (१) भराचीोव सघ-(२) हेल्वेटिक अजातन्त्र-- (३) नेपोक्ियन काल (४) सन्‌ 455४-१८५४८ का सघ-शासन (६)

( ६)

आधुनिक फाल-सन्‌ १८७४ का शासन-विघिन--सब्‌ ६8०४ के शासन-विधान का रूप--संविधान की प्रमुख विशेपताएँ--शक्ति विभाजन -फेन्द्रीय सरकार की शाक्तियोँ --संघ सरकार की श्राय--संघ विघानमणडल--द्विगुद्दी विधान मंद -निचला सदन--सदस्यों बी योग्यता- सदन का सभापति--दूसरा सदन-सदस्यों को क्रवधि - सदस्यों का येतन--सभापति-संघ विधान-मंडल को शक्तियां -सम्मिलित बैठकें--विधान मंडल. फे उल्लेख-पत्र+- सदस्यों फी योग्यता-- संघ कार्यपालिका--फेडरल्त कौंसिल की वनायट- दिना शक्ति का अध्यक्त-फेडरल फौंसिल की कार्यवादह्दी- प्रशासन विभाग - फेडरल फोसिल का कार्य संचालन-विधान मण्दल वो अजुत्तर दायो--कौंमिल के प्रभाव के बारे में आाइस का मत-फेडरल फौंसिल को सफलता -चॉपलर -संध न्यायपालिका, इसफी धनावट, इसका अधिकार पेज, न्यायपालिका की कार्यप्रणाल्री -- राजने तिक पत्त-- दखवं दी की भावना का अमय -पघुराने पह--घर्तमान राजन तिरू पत्त --शासन- विधान का संशोधन --दो प्रकार का परिवर्तदन-थांशिर संशोधन--विधान संशोधन के लिये लोकनिर्णय श्रनिवाय --कैंदनों की सरकारें --कैंटनों में अध्यक्ष जनवंत्र--के टनों के विधानमयडल्व-- शासन विधान का सशोधन -- केन्‍्टनों की कार्यपालिका--फैटनों को न्‍्यायपालिया--केंटनों में स्थानीय शाप्तन-केंटनों में शिक्षा-प्रत्यक्ष जनतन्ध (9९00. 7)6000- ८780०9५)--स्विटूजरल्ैड प्रत्यक्ष जनतन्त्र का धर है --संघ में लोक निर्ण य-- केदनों में लोक निर्एंय--ल्ोक निर्णय की गुण-दोप परीक्षा-मतदावाश्ों की श्रयोग्यता -लोक निर्णय से लाभ--संघ में अधिनियम उपक्स -- क्टनों में झधिनियम उपकस - जनतन्प्र के सम्बन्ध से स्विघ् इष्टिकोण --

आंधनियम उपकम के दोप--अ्धिनियम उपकम के समर्थकों की विचारधारइ-पाद्य घुम्तकें--

१६, सोचियट रूस की सरकार | इरे७ शासन विधान का इतिद्नस--ड्यज़ा को छुलाने का प्रथम श्रयत्व--ज्ञार की सत्ता में कोई परिवतन नहीं हुआ--सन्‌ १६६७ की ऋंति-भ्रमिकों का शासन-स्थानोय प्रान्वोय् सरकार -- निर्वाचन थौर प्रतिनिधित्व का श्राधार--ग्रास्थ और फैक्टरी स्पेवियट-डिस्ट्रिक्ट सोवियट-आदेशिक सोचियर ([०४१०००) 50ए09)-स्वाधीन डपराज्य-रूस की केन्द्रीय सरकार -- सोवियट न्‍्यायमंडल---छोटे न्‍्यायाद्यय-प्रादेशिक न्‍्यायालयथ- सर्वोच्च स्यायाबय--सघ का सर्वोच्च न्‍्यायाद्यय सोगियट श्ासन-विधान का घुनर्निमोथ - एक नये शासन-विधान के विकास का प्रयत्त -खब

( ६५ )

१६३६ की मथा दासम-विधान-हुछ थैयतिक सम्प्ति मास्य थी गई- गागरिक के मीजिक बपिशर--सप का संगदन- 5 खीय सरकार वो इवियाँ >सेप साझा को बनायद >सुप्राभ बौसिश--विधान मंदग अ्पग्‌ सदन था छोकामा-+दिवाप सदुग-विधर मंद को क्राप पादाू दोगा सदगों के भतनेदों को सुख्माना-काथ यालिदा-प्रेसीडिेसन-- बतिण आफ कमीसारस अर्षोगू लोग प्रवन्धवा परिवदू--दसंद्ी घमा। चद--परिपर दै.ते छाप बरतों है-सोविपर रास में न्‍्यायपरतिश"८ मुप्रीग फ्ोर्र (8व]706700 (णा7) -- इकाई सब्यों पी साझार-दुकाई राज्यों था उपराय्यों के विधान मंरदल-उपरार्यों पी पायपालिफा सरफारें--- ढग्यूनिस्ट-- पार्डी- पार्टी का अमुशासन-काम्यूनिः्म फे डइ शय--पार्दा का संरठन-फ्रारू्प हुस्तऐं --

२०, फ्रांस यी सरपार | ४2४४ शाप्तन पिधान या इतिद्वास-द्वितीय प्रणात-न्प्र फो स्थापना--तलोीपष प्रजातस्य-विधान मगइल -प्रतिनिधि सइन (0॥फ77067 ण॑ ॥92/प- ६009 )--फार्यपाशिफा-मम्द्रिपरिषद्‌ > ससदारमक शासन प्रणाली की अधशलता -पदला-दूपरा--सोस तह >खोषा - परी -- छटा *- प्रस के चतुर्थ प्रभावन्‍त्र का छासन-दिधान -शासन विधान के सिर्डाव-- विधान मादक - सदस्यों के अधिकार और उनको श्राप्त विशेष सुबि- पार्ये--सदनों या स्यावद्षारिक रूप--शार्यिस परिषद्‌-चत॒र्य प्रमातन्थ की कार्यपालिया-प्रेसीदेंद--नियुक्ति करने की शाक्ति -भेसीडेंद और विधान सण्दख--प्रें सोदेंट रूपैधानिक अध्यक्ष दै--मतितिपरिषद्‌-- प्रधान स्त्री की शक्तिया--मन्प्रिपरिषद्‌ और टिथान मणदल-- शासन विधाल का सशोधन--न्यायपालिका -- फ्रांस को न्यायपालिका के

ल्लिदान्व->प्रशासन अधिनियम का क्या ध्र्थ हैं ?- प्रास में प्रशासन अधिनियम का इतिद्यास--प्रशासन ऋषिनियम और अधिनियम शासत में मेइ--प्रास के न्‍्यायालय-शरोन्दाइज़मेट के स्थायालय--पुमर्धिचारक न्‍्यायालय--पुपाइज न्‍्यालालय ( &१820 (0007/48 )--सर्वोच्च घुनपिचार मस्थायाक्यय, स्थानीय शासम--प्राति के पूंध-- कम्यून,

उसकी कोसल को बनावट--कम्यून कॉसिल को कार्यवाही-कफैस्टन

प्रोडाइज्मट -ढदिपटंसेट--पेरिय (29774) - कॉसिल की बनायट--

्फास में स्थानीय संस्थाओं के विच्त--सलाधन--सद्दायक--अनुद्ान--

केन्द्रीय नियययथ-य्रेसोदेंट और शुदमस्तो का निय्रतण - सरिफ़ैजट का

नियत्रण--पाद्य पुस्तके --

(६ १) ) १९, ज्ञापान की सरकार हु श्घ८ देश फा परिचय - शासन-विधान का इतिद्दास - प्राचीन पाल- तोक गाया -शोगृनत काल-मीजी युग (१॥6 जल) छिए)- जापान से परिचिमी दिवारों का प्रपेश-- परिचिमी विचारों का प्रभाव - सम्राट को शपप फा मदस्व-” ज्ञापानी संस्याधों पर जर्मनी का प्रभाव--पीयरो/ का बनाना--मग्त्रिपरिषद्‌ का संगठने--सन्‌, १८८६ के शासन विधान की विशेषतायें--लिंसित प्रकार --कशोरठा (पघिंडांवे४)- प्रचलित प्रधा का प्रभाव-सबल राजतन्त --फेन्द्रित पद्धति -- पारधास्य राजनेतिक संस्थानों का शपनादारडण जैनरो > सन्‌ १८8८६ के शासन-विधान की डपक्रमा -- शासन-विधान सम्राट का उपद्वार - सरकार की अध्यादेश निकालने की शरक्ति- राजा की फार्यकारी शजितियाँ--राजा की न्‍्यायकारी शहस्तिया-- प्रजा के अधिकार और कत्ब्य--मन्व्रिपरिषदू--ढाइड-- प्रदी कौसिल- लाई प्रवी-सील (0,००९ #फंरप़ 868)) -+ विधान मण्डल दिंगुद्वी प्रशान्नी-- दाउस आफ पीयस में निम्नलिसित श्ोशियों फे दो सदस्य होते ये--विधान मन्‍्डल फी शक्ति -- आय व्यय पर ल्ियश्रण-- राजनीतिक पक्त -न्यायपाक्षिका--स्यायालय के प्रकार -- पश्चप्रणाली - सैनिफ स्यायालंय--स्थानीय शासन- प्रिफौ क्चर-- बढ़े नगर --आम कौर घोटे नगर-पेन्द्रीय नियन्त्रण - सन्‌ ५२४६ का शासन-विधान - नयी संविधान कैसे बना-संविधान में जनता फे अधिकार - विधान मण्डल >द्विगुद्ी मण्डल--डाइट का अधिवेश्ग्न -- प्रतिनिधि सदन का विधदन -“ कार्य दद्धति -- अधिनियम ऊेसे बनते दें १- संविधान संशोधन-7 कार्थपालिका -- सम्राट -- सन्द्रिपरिषदू---अधिनियमों को कायोौनिवत करना--न्यायपालिका--सर्वोच्च स्यायालय की शबित-- स्थानीय शासन _-आर्पिक प्रावधान -- पादय घुस्तके--

प्रमुख देशों की शासन प्रणाल्रियां

अध्याय वैधानिक सरकार

“बह बहने की श्रावश्यकता नहीं दि आदर्श शासन पद्धति वह नहीं जो सब सम्य राष्ट्रों में वाछनीय भौर साध्य हो पर वह है जो जिन परिस्थितियों में वाछनीय और साध्य समझी जाती है उनमें उससे प्रधिव से श्रधिक निवटवर्ती दूरवर्ती लाम होता हो एक पूर्ण प्रजातन्‍्त सरकार ही ऐसी सत्ता हैं जो आदर्श सत्ता कहलाने की अधिवारी है--(जे० एस० मिल)

राज्य समाज का सयसे उन्नद रूप है--मनुष्य ने भपने जीवन के विभिन्न स्वरृपो को तरह तरह के समुदाय बनाकर व्यवत क्या हूँ, पर समाज का राज नैतिक सगठन करने में उसने मानव चतुरता की परावाप्ठा बर दी है। इस प्रत्तिया में बहुत से प्रयोग क्ये गये आरम्भ में प्यंटनशील टोलियो से लेकर पश्मु चराने वाली जातिया, तुदुम्ब समुदाय और प्रन्त में आधुनिवः राजनैतिक समाज का विकास हुक ऐसे सामाजिक जीवन म॑ ही मनु प्य ने श्रपना पूर्ण विकास पाया हैं और साथ साथ उन लागोका हित साधन क्या है जिनसे उसका कौदुम्बिक, सास्हृतिक और झाथिव सम्बन्ध हे

ऐसे ही समाज में, जिसको हम राज्य कह कर पुकारते है, सभ्यता का विकास, विज्ञान की वृद्धि, कला की प्रगति, सिद्धान्तो का प्रतिपादन व्याख्या और प्रगतिशील मानव का निर्माण सम्भव है

मानव जाति अपने इतिहास के बहुत से उतार-चंढावो वे पदचातू अपनी वर्तमान स्थिति पर पहुची है। मानवजाति को कई घातो और प्रतिघातो के बीच से होवर निकलना पडा हैं। सभ्यता प्राहृतिक-मनुष्य का वह भार है जो उसनें अपने प्रस्तित्व की रक्षा वे लियें थोडा थोडा करके लाद लिया है इसोलिये बा इतिहास का विस्तृत लेख है

ब्रमस देशों वी शासन प्रस्माजियां

राज्य वा ऐविदासिक आधार--माय समुदीगों शा ध्ध्यवार सरने में यह भरावस्यया हैं कि उसकी शीीक्ञाशित्र पृष्ठ भूमि पर बराबर दृप्दि रखी जाय पर ऐसिटासिक घटनाधों वी जदिलता ऐसी # हि विगी माजव समाद मा जाती कौ सरइति वो समझे ने लिये यह जाना झावस्यव है रि वी शसमाज पिन पिस विदिष्ट ग्रधस्पापों परिग्पातियों में रहा हैं। एसॉतियें विगी समात्र में' प्राधरण वो केवल मनोर्वश्ञतिवा छाधार वर समझ मर उगझी परतेसाग शंरप्राति मै रूप थो प्रतिष्ठित सही विया जा साला

श्यति में प्यगी सामाजिक घोर प्राथित्र परिरिथितियों वी कया मांगे” विन प्रतित्रिया दोसी है, इसया चाहे दुमतों विजला दी प्रधित ज्ञान कया मे हों जाप पर मैवत मनोधिशात पी सहायता से हम विशी गसाज वी सस्दधि वा शाज्या रूप स्थिर परने में सपल नद्ी हो सफ्ती इसे भ्रतिरिकत बिश्य में जो यायायरण धादि की विविधता है, बदुत छुछ उसके ही कारण मावद गस्याप्रो, उनये गृख तावो, प्रभारों मोर गिदात्तों में भेद हैं

विधान द्वी सामाशिक संगठन थी रूप-रेख्या या छोतक दे--सावव सेरयाप्रों मा सबररे भ्रधिव व्यापन शुण व्यक्तियों भोर समस्याग्रो वे दोच धक्ति- मूलर सम्बन्ध हैं। एस सम्बन्ध वो विधान द्वारा स्पप्द जिया जाता हैं। विधान में सत्या मे भाधारभूत सिद्धान्तों का ही समावेश नहीं होता पर उसमें राजन: लिब संगठन वी रूपरेसा भी निश्चित बर दी जाती हैं भ्र्थात्‌ उसम यह स्पष्ट + पर दिया जाता है वि सरकार क्सि प्रवार बनाई जावधी झौर उसवा वार्यत्रम क्सि प्रसार वा होगा सानव इतिहास के मिश्र भिन्न विरास दुगो में विभिन्न भासन पद्धतिया भचलित रही हैँ पुरानी श्रोर आजवल कौ शासन पद्धति का सबसे प्रमुख भेद यह है कि जहा प्राचीन वाल में लोगो की बुल सख्या का एक बहुत थोडा झ्श राज्य वार्य में सम्मिलित होता था वहा भ्रव प्रवृत्ति यह हूँ कि राज्य वाये में सम्मिलित होने का भ्रधिकार प्रत्येक ऐसे प्स्ष या स्त्री

फो हों, जो परिपक्व बुद्धि रखता हो और प्रत्येष समूह या जाति का हो, भ्र्वातू जो राज्य निष्य हो

इससे स्पप्ट दे कि प्रत्येक राज्य भपने लिये ऐसे विधान की रचना वरता हैं जो उसकी भोगोलिक, भ्राथिक, सामाजिक तथा सजर्नतिक परिस्यितियों वे अनुकूल हो ये परिस्थितिया भव जगह एक्सी नहीं हैं इसलिये तब राप्टो के विधान भी एक से नही है इसी विभिन्नता वे. वारण भिन्न भिन्न शासन प्रणालिया

वैधानिक सरकार 7 डरे

संसार में प्रचलित है किसी भी मानव समूह को समृद्धि श्रधिकतर उसके राज- मैतिक सगठन और शासन पद्धति पर निर्भर है। आचार्य वर्क ने कहाथा कि सरकार मानव बुद्धि का वह झाविष्फार हैं जिसको उसने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिसे बनाया है, मनृप्यो वा ग्रह नैस्तगिक भ्धिकार है कि यह बुद्धि या अनुभव-जन्य ज्ञान उसकी इच्छाओं की पूर्ति होने की उचित व्यवस्था करे। इस कथन में वृद्धि या अनुभव-जन्य ज्ञान छाजद महत्वपूर्ण है यदि कोई सरकार बुद्धिमानो के अनुभव-जन्य ज्ञान पर आधारित नही है और व्यक्तियों की आव- इयकता्रो को पूरा करने में असमर्थ है तो वह सरकार एक कौड़ी की भी नही कजिन ((0ए»0) का यह कथन सत्य हैं कि व्यकितयों पर शासन उनकी सेवा करके ही किया जा सकता है, इस नियम में कोई अ्पवाद नहीं मिलता शासन करना और सेवा करना ये दोनो विरोधी बाते मालूम होती हैँ पर त्तिस्सदेह ये शासन की झ्राधुनिक कल्पना की द्योतक है इस कल्पना को तव तक कार्यरूप में परिणत करना कठिन हूँ जब तक राज्य और व्यक्ति के सम्बन्ध को, उनकी निबिरोध एकता की नीव पर, दुढता से स्थायी रूप में नही स्थिर किया जाता मानव सुख के लिये केवल यह पर्याप्त नही कि किसी विशेष समय पर ऐसी सर- कार हैँ जो सब प्रकार से श्रच्छो है | उसके लिये इस बात की झ्ावश्मकता है कि सरकार का सगठन किस प्रकार होता है और शासन पद्धति कंसी है। हम आचार्य प्रोष के इस कथन का आजकल विल्कुल आदर नदी कर सकते कि मूर्स ही शासन पद्धत्ति के बारे में लडते भिडते है, जो सरकार अच्छा शासन करती है वही ग्रच्छी है | सरकार में कौन कौन व्यवित शासन सूत्र को हाथ मे लिये हुये हे मौर शासन प्रणाली कंसी हैँ ? इन दोनों का उतना ही महत्व है जितना कि उनके शासन प्रवन्ध की प्रच्छाई या बुराई इसमे स्पप्ट हैँ कि राज्य सें ऐसा सगठन होता चाहिये, ' जिसमें श्ञासितो के ही हाथ मे राज्यशक्ति हो और वे अपनी बुद्धि के अनुसार उस दबित बा सचालन करने में स्वतन्त्र हो। आत्म भअनुदासन से ही जीवन सुधरता हैँ ओर राज्य का उद्देश्य जीवन को सुधार कर उन्नत करना है। झात्म- प्रनुधासन राज्य संगठन में तभी होगा जब सख्वार छोक प्रितिनिधियों की होगी भौर वह छोवसम्मति से ही शासन करेगी, श्र्थात्‌ जब प्रजा बा सरकार पर पूर्ण निमत्रण होगा प्रजातस्वरात्मक शासन में यह आवश्यक है. कि राज्य दवित को छोजहिंत॑ की दृष्टि से भर्यादित बर दिया जाय भौर इस पर निय्ण रखा जाय इसी उद्देश्य से श्राधुनिक सरकार कसी विधान से भर्यादित रहती+ है 4

संविधान की परिभाषा--प्रसिद राजश्ास्त्री ब्राइस ने वहा हैं कि

विसी राज्य या राष्ट्र का सविधान ये नियम ग्रा विधि हे जो उसको सरवार वा

प्रगुस देशों वो चागा प्रणालिया

कप निश्थित मरते कै भर दस राख्बार मे गागरियों मे दरति गया पर्॑व्य है भौर बपा धपिवार हैं इगता निर्णय बरले हैं परी (वशा९३) के धतुसार रिसी देश ये विषात गे उस निर्दन्पों वा निर्देश है जिया सावस्प, देश मे ख्यवस्थापा गण्डव मे मास रुप, व्यवस्थापत्रन्मण्दल ने भिन्न भिन्न भ्वययों में पटरधरिव गग्बन्प ध्रौर ग्यायावयों मै बनो ये उसने प्रधिवार क्षेत्र से हैं। विधान रारप विधि का ही एप प्रमुण विभाग हूँ शिसत्री टंसरी दिधियों रे श्सी प्रापाट पट पृषझ गिया जा गयता #ू दि यह राज्य सगदा थे एक प्रमुण महत्यशाली विषय से गरवग्पित है, जिनसे राज्यशतिर वे सूचधारा वा परिघय भौर उनसे पारसरिव' शसाम्यस्थी का नियसन होगा है, या जो उस रीति पा प्रम निर्णय परले है लिससे सज्य- सत्ता या सशाधारी प्रपने भधिएरों शा प्रयोग बरणोंड़ | गिलतिस्ट (छान ०४१६) ने छा तिसि। या घत्रितित विधियों वो संविधान कहा हूँ गिनसे राग्यगप्ता बे सगदात की रुप-रेसा निश्चित होती है. या जो सरकॉर के विभिन्न भ्रगा में राज्यधरशि वितरण को सथा उन सिद्धान्ता वो तिश्चित फर्ने हैं जिनमे प्रवुगार इस राज्यशवित का सायावत द्वो यह रपप्ट है. ति संविधान में हमें णिसी रामाज गयी उन राजनैनिय गस्पासा पा सित्र देराते मो मिसता है जिनमें रह बर उस समाज थे स्य्ति प्पता जीवन विताते हे $ एस चित्र में बेवत मोटा भायार ही दिपाई देता है, उसके भीतर भरे हुये विविध रग दिलाई नही पडते इन रगो शो रामझने के लिये हमें युछ धौर प्रयत्न घरता पड़ेगा हमें उस राष्ट्र की सामा- जिएा झौर स्‍झ्राथिक परिस्थितियों गा अम्ययन वरना पड़ेगा, उसकी सस्क्ृति को परम्परा जातनीं होगी और उसके प्राचीन इतिहास की पृष्ठभूमि पर अपनी दृष्ठि डालती पड़ेंगी संपिधान की आनश्यक्ता--मानव इतिहास वे लम्पे समय में बई युग हुये हे जितकी अपनी अ्रपनी पृथक विशेषतायें रही हैं। सुदूर भवीत काल में जिसका घृधला ज्ञान भ्रव हमें पुरातत्वना या पुरविश्वेयज्ञों के श्राविष्यायरों से होता जा रहा है, हमें कठिनता से कोई ऐसे नियम मिलते है जो मनृष्य वे प्रतिमा या कर्तव्य भत्रित के परिचायक हों क्दाचित्त्‌ वह समय ऐसा था जब दइ का जोर था और मत्स्यन्याय की प्रवलता यी। श्रर्यात्‌ जैसे चड़ी मछली छोटो मछली को खा जाती हैं उसी प्रकार एक व्यवित दूसने को कुचल कर अपना हित साधन कद्ता था ऐसी झवस्था में छो अधिक शक्तिशाली था बी झपनी जीवम-रक्षा वर सकता था। सबसे शक्तिशाली जीव द्दीकी जीवन सवर्प में जीत होती है, उस समय तिस्मन्‍्देह व्यावहारिक रूप में

दिखाई पडना होगा उस समय में सिद्धान्तो दियमों का झायन ने होता के

चैधानिक सर्रबार

था, पुरुष विशेष ही शासन करता था। उसकी आज्ञा वा पालन इसलिये किया जाता था क्योकि वह्‌ श्रपने बल प्रयोग द्वारा दूसरों को अपने भाधीन कर निखुश होवर उनसे काम करा सकता था और अपने नियबत्तण में विभिन्न वर्गों या व्यवित सम्‌हो को रखने मे समर्थ था। पर जैसे जैसे मानव बूद्धि नं! विकास हुआ और वर्गर मनुष्य सभ्य हुआ, शताब्द्रियों पश्चात्‌ जब देह-बल के ज््यान पर वुद्धि-वल विबेक की प्रधानता हुई, तब एक नये युग का श्री गणेश हुआ और सानव ने उस युग में पदापंण किया इस नये युग से प्राचीन अम बिलकुल उल्दा हो गया और, पुरुष विशव के स्थान पर नियमों का शासन होने लगा राजा के साथ साथ समाज के दूसरे व्यग्ति भी शासन में भाग लेने लगे इसी समय वैधानिक सरकार की भी उत्पत्ति हुई और शासन कार्य उसकी पद्धति बुद्धि गम्य होने लगी

संविधान का इतिहास--यूरोप में सबसे प्रथम यूवानी दार्शनिको ने इस और ध्यान दिया कि' राज्य का रूप बया होना चाहिये उन्होने राज्यतन्त के मूल- तत्त्वों पर विचार किया और उन तत्वों के अनुसार राज्य वा संगठन कैसा होना चाहिये, बिन व्यक्तियों के हाथ में राज्य शत रहनी चाहिये और उनको उस शवित का किस उद्देश्य से प्रयोग करना चाहिये, इन सब बातो की विस्तृत बिवे- चना वी घ्लेटो प्रौरविशेषकर प्ररस्तू ने विभित राज्य सस्थाग्नी का वर्गीकरण किया और उस वर्गकरण के श्राधारभूत सिद्धान्तो को बतला कर उन राज्य सगठनो की भ्राछोचना की उन्होने यह स्थिर किया कि राज्य में किन नियमो की भ्रावश्यक्ता होती हे उनके पश्चात्‌ परद्वह शताब्दियो तक बराबर यह प्रयत्न होता रहा कि राज्य को एक सुसगठित सस्था विस प्रकार बनाया जाय जिसके मिवासियो मे सामाजिक झ्ौर साल्कृतिक विरोधाभाव हो और जो सदमाव और प्रेमपूर्वक' मिलकर रह सके ऐसे राज्य संगठन का विवास धीरे घीरे हुआ जागीरदारी प्रथा के समाप्त होने पर एक नई विचार-धारा का झ्राविर्भाव हुआ, जिसने निरुश शासन की जड़ हिला दी और राज्य के प्रति प्राचीन मनोवृत्ति ऋत्तिकारी हलचल भौर परिवतंन कर दिया॥उस हलचल के' फ्लस्वरूप राजनंतिकः जीवन को ये ज्ञात ज्ञातव्य सिद्धान्तो के श्राधार पर सुदृढ बनाने में बडा प्रोत्साहन मिला

*

यूरोप में इग्लेण्ड ऐसा देश था जहा सबसे प्रवम प्रजा के श्रधिवारों की प्रधानता को मान्य कराने वा प्यास विया गया और इस विचार को दृढ़ बनाया गया ए्ि राज्य में प्रजा पा ही भ्धित महत्व हूँ और राज्यनाय छोक

हु प्रमुख देशों वी शासा प्राधातिया

सम्मति मे ही घन शवता है भौर खतना भाहिये इगसिये बैंधातिर शासन पद का जप पहदे पहव इंगण्ट में [पा उसे पश्चात्‌ इसपा प्रचार यूरोत मे दूगरे देशों से, प्रमरीवा में भौर पिश्य वे दूसरे राष्ट्रा में हुआ भौद यटें पति गर्यंत धपना ली गयी

धैधानिगा सरधार इसलिये ऐसी शासन पद्धति है जिसमें नियमों ये प्रनुमार शासन गाय होगा हैं ) शासकों वी सवा, के उनती रवेच्छासारिता यी प्रभुता नहीं होती बरन्‌ प्रजा थे योगन्शेम वा विचार ही राजनैतिव संगय्स यो रूप रेखा निश्चित बरता है | इतना ही नही, प्रजा थोडा या बहुत राजवाज मे भाग ऐती हैं भौर राजनीति, शासन नीवि तथा शायतरों पर झ्पने नियन्र्ण रखती हैँ

ईंगलैण्ड मे संतिधान का विवास--छुगर्रण्ड में 'कब्स्टीट्यूडन' या गविधान शाद वा प्रयोग सबसे प्रथम उन श्राचीन प्रचलित रीति रिवाजों वै लिये किया गया या जिनवी वहा वे तत्लाटीन राजा ने अपनी परिषद्‌ को सम्मति से घोषणा की थी हैनरी द्वितीय ते सन्‌ ११६४ ई० में ऐसे नियमों वा प्रचार किया जिनसे उस समय वी झौजिव' श्लौर धार्मिक न्याय संस्थाओं का पारस्परिवः सम्बन्ध निश्चित हुआ ये नियम वदेरण्डन के भन्स्टीट्यूइन्स (0०ा8॥प॥7णा8 0]8707007) वे नाम से प्रसिद्ध है। ये कोई नये नियम थे जितका नये सिरे से निर्माण किया गया था। वे तो केवल पुरानी अचलित अथायें थी जिनको लिखित रूप में लाया गया था भौर यथाविधि भोपषित कर दिया गया था। यही वात उन धविधानों वे! सम्बन्ध में भी लागू होती है जिनकी धोपणा १२१५ ई० में जोन नामक राजा से उसके जागौरदारा में करवाली थी। मंग्ता कार्टा (७९78 (७7५७) में ऐसी हो मौलिक या प्रायमितर रीति रिवाजो का विस्तृत वर्णन था इस प्रलेख में केवल उन रीति- रिवाजा वो परिभाषा कर दी गई थी | कोई नयें नियम या विधियां प्रतिपादित भही किये थे इतको भी करेरेण्डन के कन्स्टीट्यूडन्स के समान रनीमीड ने फन्‍्स्टीट्यूडन्स ( 00४४प्रागरणा5 0 [हप्राणएा/९१७ ) कह सकते है दोनो में कोई विशेष भेद नहीं है | पर इनका महत्व इसलिये माना जाता है कि उनके द्वारा राजा मे जो रीति रिवाजो एवं परम्पराम्ा के सामने झात्म समर्पण किया उससे वैधानिक सरकार का यू रोप वीजारोवण हुआ यह सिडान्त मान लिया गया कि राज्यतत्र का आधार लोइसम्मति है परन्तु झ्रानें बालो

जज वीक जो 5 जो

शताब्दियो मे जो शासन नीति इगरैण्ड मे मान्य हुई उसके आधारभूत सब सिद्धान्त इन विधानो और अधिकार पन्रो में बणित नही है समय समय पर इन प्रढेखो में पारिभाषित रीति-रिवाजों एवं परम्पराओं को दूसरे विधानों द्वारा स्वीकृत क्या गया झौर उनमें नय सिद्धान्तों को जोड दिया गया ये दूसरे विधान, आवसफोई के प्रविधान, (?70शांधणा8 05070) सत १२५८ ई०, मार्दमेन का विधान (5080प्रा 0 ि०070ए७४॥7) सन्‌ १२७८ ई०, विन्वेस्टर का विधान (80०60766 शश॥्रणा०४६००) सन्‌ १२८५ ई० आदि के नाम से प्रसिद्ध है इनके पश्चात्‌ सन्‌ १६४७ ई० में क्रौमवेल के सिपा- हियो ने एक जनता का करार (2 87९७४7७7४ 67 ४6 76०7७) बनाया और १६५३ ई० में त्रौमवेल ने एक शासन विलेख (]7 8767४ 0०९ 60०0ए०७०४77०॥६) घोषित किया यह अन्तिम विलेख एक विधिवत्‌ लिसा हुआ्रा सप्धृर्ण सविधान था इसमे सविधान के अ्रन्तगंत जो प्रमुख बाते भाती हैं उनका विस्तृत वर्णन था और विधान मण्डल तथा कायंपालिका के अधिवारो का उल्लेख कर दिया गया था। इस सविधान के द्वारा एक अगरेजी प्रजातन्त राज्य की स्थापना बरतने का विचार था, जिसके व्यवस्थापक अधिकार एक विधान मण्डल को और एक झाजीवन रा'द्रपति को सुपुर्द थे। पर यह सविधान पालियामट