एवम्‌

कक्षा 6 के लिए पाठ्यपुस्तक

लेखक

के.एम. पंत राजेन्द्र जोशी जे.एस. गिल रवि प्रकाश कन्हैया लाल एस.सी. अगनरकर जयश्री शर्मा एस.सी. जैन वी.एन.पी. श्रीवास्तव वी.जी. जाधव वी.पी. श्रीवास्तव

अनुवादक

राजेन्द्र जोशी के.एम. पंत्त एम.पी. सिन्हा कन्हैया लाल

संपादक के.एम. पंत राजेन्द्र जोशी

आ्ाच्धच्ीीय शोध्विक जन्तुस्॑धाना और अशिशक्षष्णग फपरिघिवद 8]0॥38। ७09000॥ 07 ६00७88॥0088/ ॥६६६५७४8७४ #४0 4/॥४४5

प्रथम संस्करण कप [580 8-7450-039-] जुलाई 2002

आषाढ़ !924

7950॥ पिटर-5

( राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्‌, 2002

अकस यप सुरांद्िकष «4. प्रकाशक की पूर्व अनुमति के बिना इस प्रकाशन के किसी भाग को छापना तथा इलेक्ट्रॉनिकी, मशीनी, फोटोप्रतिलिपि, रिकॉर्डिंग अथवा किसी अन्य विधि से पुनः प्रयोग पद्घति द्वारा उसका संग्रहण अथवा प्रसारण वर्जित है।

«. इस पुस्तक कि बिक्री इस शर्त के साथ की गई हैं कि प्रकाशक की पूर्व अनुमति के बिना यह पुस्तक अपने मूल आवरण अथवा जिल्द के अलावा किसी अन्य प्रकार से व्यापार द्वारा उधारी पर, पुनर्विकय या किराए पर दी जाएगी, बेची जाएगी)

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कद), ड़ 2४४६ सैर को 0 परफ्राउट

एनसीईआर,टी. कैम्पस 00, 00 फीट रोड, होरडेकेरे नवजीवन ट्रस्ट मवन सी.डब्लू सी, कैम्पस

श्री अरविंद मार्ग हेली एक्सटेंशन बनाशंकरी इस्टेज डाकघर नवजीवन 32, बी.टी, रोड, सुखचर नई दिल्‍ली ॥006 ब्रेंगलूर 880 088 अहमदाबाद 360 00६. 24 परगना 743 479

प्रकाशन सहयोग संपादन: राजपाल उत्पाद. : डी साईं प्रसाद सुबोध श्रीवास्तव सज्जा : अमित श्रीवास्तव

आवरण : ॥श२० पोस्टर द्वाग प्रेरित

रु, 30.00

एन.सी.ई.आर.टी. वाटर मार्क 80 जी.एस.एम, पेपर पर मुद्रित

प्रकाशन विभाग में सचिव, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्‌, श्री अरविंद मार्ग, नई दिल्‍ली

!0 0]6 दूवारा प्रकाशित तथा बंगाल ऑफसेट वर्क्स, 335, खजूर रोड, करोल बाग, नई दिल्‍ली 0055 दबारा मुद्रित

आ्ीजफर्थन

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-]986 ने सामान्य शिक्षा के एक अभिन्न अंग के रूप में विज्ञान के पठन-पाठन को आवश्यकता पर बल दिया है। शिक्षा नीति में यह स्पष्टतः उल्लिखित है कि इस स्तर पर विज्ञान की शिक्षा विभिन्न शाखाओं के रुप में होकर केवल एक विषय के रूप में दी जाए। तथापि, गत सोलह वर्षों के दौरान, विज्ञान के अधिगम में अपने उचित परिप्रेक्ष्य में, विशेषकर समाज के साथ इसकी प्रा्संगकता की दृष्टि से इसमें अत्यधिक परिवर्तन हुआ है। प्रौद्योगिकी की उच्नति ने हर क्षेत्र में बच्चों को इस प्रकार की शिक्षा प्रदान करना अनिवार्य बना दिया है जो विज्ञान, प्रौद्योगिकी और समाज में परस्पर स्पष्ट रूपेण संबंध स्थापित कर सके और इस प्रकार के प्रौद्योगिको -आधारित समाज में प्रभावपूर्ण ढंग से जीवन यापन के लिए आवश्यक ज्ञान एवं कोशल प्रदान करने में सक्षम हो।

प्रस्तुत पुस्तक राष्ट्रीय शिक्षा नीति में निरुपित आकांक्षाओं की पूर्ति हेतु लिखी गई है। इस पुस्तक के द्वारा विज्ञान और प्रौद्योगिकी को प्रस्तुत करने हेतु एक सार्थक प्रयास करके वर्तमान मानवीय प्रयासों के अधिकांश क्षेत्रों को सम्मिलित किया गया है। वांछित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इस पुस्तक में कुछ विषयों जैसे विश्व, पर्यावरण के घटक, सरल मशीनें, ऊर्जा और सामुदायिक स्वच्छता को सम्मिलित किया गया है।

पुस्तक में सम्मिलित विषय-वस्तु और सुझाए गए क्रियाकलापों को समकालीन संदर्भों और कौशलों एवं अभिवृत्तियों को विकसित कर ज्ञान प्रदान करने के लिए संगठित किया गया है। हमारे देश की विभिन्न आवश्यकताओं, व्यापक विद्यालयी पद्धतियों की पृष्ठभूमि और पर्यावरण के अनुकूल सुझाए गए क्रियाकलापों से पाठ्य-सामग्री को विकसित करने का एक सार्थक प्रयास किया गया है। विषय-बस्तु को सरल भाषा में प्रस्तुत करने पर विशेष ध्यान दिया गया है। सुझाए गए क्रियाकलाप इस प्रकार से प्रस्तुत किए गए हैं कि उन्हें कम लागत वाले उपकरणों और विद्यालयों अथवा घर में सामान्य रूप से उपलब्ध सामग्री से निष्पादित करना संभव हो सके।

इस पुस्तक का प्रथम प्रारुप ऐसे विशेषज्ञों के एक समूह द्वारा विकसित किया गया जिन्हें अध्यापन और

अनुसंधान का व्यापक अनुभव प्राप्त है। तत्पश्चात्‌ एक कार्यशाला में इस प्रारुप का पुनरीक्षण किया गया जिसमें शिक्षकों, शिक्षक-प्रशिक्षकों और विषय-विशेषज्ञों द्वारा विषय - वस्तु एबं उसके प्रस्तुतीकरण की समीक्षात्मक विचेचना की गई। पुनरीक्षण कार्यशाला में प्राप्त टिप्पणियों और सुझावों पर लेखकों द्वारा विचार किया गया और प्रारुप को उपयुक्त रुप से संशोधित किया गया। '

लेखन-दल ने विज्ञान की पूर्व-पाठ्यपुस्तक के प्रयोक्ताओं से प्राप्त सुझावों और पुनर्निवेशन का उपयोग किया है। वर्तमान पुस्तक के विकास में आवश्यकतानुसार पूर्व प्रकाशित पाठ्यपुस्तक से संदर्भों का भी उपयोग किया गया है। प्रस्तुत पुस्तक में सुधार के लिए सुझावों का स्वागत है।

में लेखन-दल के सदस्यों, इसके अध्यक्ष, संपादकों, समीक्षकों और इस पुस्तक के अनुदित संस्करण : को तैयार करने से संबंधित सभी विशेषज्ञों एवं संबद्ध संस्थानों को धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ।

| जे,एस.राजपूत नई दिल्‍ली | निदेशक

फरवरी 2002 राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्‌

गांधी जी का जन्तर

तुम्हें एक जन्तर देता हूं जब भी तुम्हें सन्देह | ही /॥| हो या तुम्हारा अहम्‌ तुम पर हावी होने लगे, -)) | तो यह कसौटी आजमाओं :

जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने

।/ /5| देखा हो, उसकी शकल याद करो और अपने

| दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार 2

0 कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना | (| उपयोगी होगा क्या उससे उसे कुछ लाभ

*| पहुंचेगा ? क्या उससे वह अपने ही जीवन और | |

( भाग्य पर कुछ काबू रख सकेगा ? यानि क्‍या

! १७ उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज्य मिल

|| सकेगा जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा हैं ? (5७

आमुख

उच्चतर माध्यमिक स्तर पर विज्ञान को अभी तक सामान्य शिक्षा के एक अंग के रुप में पढ़ाया जाता रहा है। इसका शिक्षण एक विषय के रुप में किया जाता है। अब यह अनुभव किया जा रहा है कि प्रौद्योगिकी हमारे जीवन को गुणवत्ता को अधिकाधिक प्रभावित कर रही है। अतः हमारे दैनिक जीवन में प्रौद्योगिकी को विज्ञान के विभिन्न सिद्धान्तों के अनुप्रयोग पर बल देने के लिए उच्चतर प्राथमिक स्तर पर विज्ञान पाठ्यक्रम में प्रौद्योगिकी के घटक को सम्मिलित करने को आवश्यकता महसूस की गई।

उच्चतर प्रार्थमक स्तर पर विज्ञान की इस पाठ्यपुस्तक में सुधार करने तथा अद्यतन करने का वर्तमान प्रयास, प्रयोक्ता समूहों से पुननिवेशन, ज्ञान को नवीन विचारधारा के आविर्भाव और वचिज्ञान-संबंधित मूल्यों के आधार पर किया गया।

उच्चतर प्राथमिक स्तर पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के शिक्षण से संबद्ध अध्यापकों, शिक्षाविदों, विभिन्न माध्यमिक शिक्षा बोडों द्वारा नामित व्यक्तियों, विभिन्न राज्यों /संघशासित प्रदेशों के शिक्षा निदेशालयों एवं एस.सी.ई.आर.टी. के प्रतिनिधियों, सामान्य जन और विश्वब्रिद्यालयों, महाविद्यालयों और परिषद्‌ के संकाय सदस्यों के साथ विभिन्न स्तर पर को गईं चर्चाओं से पाठ्यचर्या के संबंध में उभर कर आए कुछ प्रमुख विचार इस प्रकार हैं -

- पाठ्यचर्या को सामाजिक परिवेश और व्यक्ति विशेष के जन्म से संबद्ध पूर्वाग्रहों को निष््रमावित करने तथा सार्वजनिक समभाव एवं समानता की भावना के प्रति जागरुकता का सृजन करने योग्य होना चाहिए। बालिका शिक्षा को विशेष बल प्रदान करने के अवसर प्रदान करना।

- पर्यावरण के संरक्षण और ऊर्जा के प्राकृतिक स्रोतों का बिवेकसम्मत उपयोग। देशीय ज्ञान और प्राचीन काल से अब तक विज्ञान और गणित में भारत के योगदान का समुचित समावेश '

- दैनिक जीवन में विज्ञान के प्रौद्योगिकौय अनुप्रयोगों को भूमिका।

- द्वुतगामी सूचना-प्रसार, संचार और अंतरिक्ष विज्ञान प्रौद्योगिकी की चुनौतियों का सामना

करना।

- अप्रचलित और अनावश्यक विषयवस्तु को हटाकर पाठ्यचर्या के बोझ में कमी तथा माध्यमिक स्तर पर

विज्ञान और प्रौद्योगिकी के शिक्षण के लिए आवश्यक ज्ञान एवं कौशल प्रदान करना।

- सौंदर्यपरक संवेदनशीलता का विकास और सभी सजीव वस्तुओं के प्रति संवेदना की भावना का

विकास। प्रस्तुत पाठ्यपुस्तक की विषयवस्तु विकसित करते समय निम्नलिखित बिंदुओं को विशेष रुप से ध्यान में रखा गया हैः () . इस स्तर पर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के शिक्षण के लिए समाविष्ट संकल्पनाओं तथा विषय-वस्तु को एक नवीन स्वरुप दिया गया है और इन्हें एक विषय के रुप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। () . विश्व, हमारा पर्यावरण, पदार्थ, मापन, सजीव जगत, ऊर्जा,कृषि और पोषण एवं स्वास्थ्य जैसे विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत विषय - वस्तु का चयन करते समय न्यूनतम अधिगम स्तर के कुछ अवयवों को सम्मिलित करने का प्रयास किया गया है।

(शं)- (॥) इस स्तर हेतु उपयुक्त कुछ वैज्ञानिक सिद्धान्तों से संबद्ध प्रौद्योगिकीय अनुप्रयोग के समाकलन द्वारा विद्यार्थियों में वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय साक्षरता विकसित करने पर बल दिया गया है। (६९). विषयवस्तु को इस ढंग एवं भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है जिससे उच्चतर प्राथमिक स्तर पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी शिक्षा विद्यार्थियों को जीवन संबंधी कुछ मूल्यों को विकसित करने के अवसर प्रदान कर सकें। मे (५) प्रस्तुत पठन-सामग्री में अनेक क्रियाकलाप सम्मिलित किए गए हैं जिन्हें विद्यार्थी स्वयं कर सकते हैं। इनमें से अधिकांश क्रियाकलाप सरल हैं और इन्हें कम लागत एवं देशी सामग्री का उपयोग करके विद्यालय अथवा घर में कार्यान्त्रित किया जा सकता है। पाठ्यचर्या के बोझ को कम करने के उद्देश्य से तथा विषय-वस्तु को भली-भाँति समझाने के लिए पठन सामग्री में अनेक ऊदाहरणों का समावेश करने का प्रयास किया गया है। प्रस्तुत पाठ्यपुस्तक में भौतिक और सामाजिक पर्यावरण की भूमिका, कार्य-ऊर्जा में संबंध, वैज्ञानिक नामों का उपयोग करने के लाभ, पौधों और जीव- जन्तुओं का आशिक महत्व, व्यक्तिगत और सामुर्दायक स्वच्छता और भारतीय वैज्ञानिकों का विज्ञान और गणित विशेषकर गणित-ज्योतिष में योगदान कुछ ऐसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं जिनके विषय में यथोचित जानकारी सम्मिलित करने के प्रयास किए गए हैं। मूल्यांकन को सुगम बनाने के लिए प्रत्येक अध्याय के खंड तथा अध्याय के अन्त में विभिन्न स्वरुप एवं कठिनता-स्तर के प्रश्न दिए गए हैं। शिक्षार्थियों और अध्यापकों के तात्कालिक संदर्भ के लिए प्रत्येक अध्याय के अंत में प्रमुख शब्दों की सूचो और सारांश दिए गए हैं।

लेखक

. प्रोफेसर एल.एस. कोठारी (अध्यक्ष) अध्यक्ष भूतपूर्व

भौत्तिकी एवं खगोल भौतिकी विभाग दिल्‍ली विश्वविद्यालय, दिल्‍ली

डा. एस.सी. अगरकर

होमी भाभा सेन्टर फॉर साइंस एजूकेशन टी.आई.एफ.आर,

मुम्बई

प्रोफेसर रवि प्रकाश जीव विज्ञान विभाग एम.डी. विश्वविद्यालय रोहतक, हरियाणा

प्रोफेसर एस.सी. जैन 'डी.ई.एस.एम. एन.सी.ई.आर.टी. नई दिल्‍ली

प्रोफेसर वी.एन.पी. श्रीवास्तव डी.ई.एस.एम.

एन.सी.ई.आर .टी.

' नई दिल्‍ली - 0 06

डा. के. एम, पन्‍त (समन्वयक) डी.ई.एस .एम. एन.सी.ई.आर.टी.

' नई दिल्‍ली

लेखन-दल

कन्हैया लाल भूतपूर्व प्राचार्य शिक्षा निदेशालय दिल्‍ली प्रशासन

प्रोफेसर जे.एस.गिल डी.ई.एस.एम. एन.सी.ई.आर.टी. नई दिल्‍ली

प्रोफेसर जयश्री शर्मा डी.ई.एस.एम. एन.सी.ई-आर.टी. नई दिल्‍ली

डा, वी.पी. श्रीवास्तव डी.ई.एस.एम. एन.सी.ई.आर टी, नई दिल्‍ली

प्रोफेसर बी.जी. जाधव क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान भोपाल

मध्य प्रदेश

राजेन्द्र जोशी

डी.ई.एस.एम. एन.सी.ई,आर टी.

. नई दिल्‍ली

पाठ्यपुस्तक विकास तथा पुनरीक्षण कार्यशाला के प्रतिभागियों की सूची

प्रोफेसर एल.एस. कोठारी (अध्यक्ष)

पूर्व अध्यक्ष भौतिकी एवम्‌ ख़गोल भौतिकी विभाग

दिल्‍ली विश्वविद्यालय, दिल्‍ली

कन्हैया लाल

प्रिंसिपल (अवकाश प्राप्त)

शिक्षा निदेशालय, दिल्‍ली प्रशासन प्रोफेसर के के तिवाड़ी

क्षेत्रीय निदेशक

एम पी भोज मुक्त विश्वविद्यालय जबलपुर, मध्य प्रदेश

ललित गुप्ता

टीजीटी (विज्ञान)

राजकीय सर्वोदय बाल विद्यालय उत्तम नगर, नई दिल्‍ली

लता श्रीनिवासन

दीजीटी (जीव विज्ञान)

भदर इंटरनेशनल स्कूल

श्री अरविन्द मार्ग, नई दिल्‍ली नविता आर्य

टीजीटी (विज्ञान)

मौसम घिहार, दिल्‍ली

रश्मि चंदोरकर

टीजीटी (विज्ञान)

डी.एम. स्कूल, क्षेत्रीय शिक्षण संस्थान भोपाल, मध्य प्रदेश

प्रोफेसर रवि प्रकाश

बायो-साइंस विभाग

एम.डी, विश्दविद्यालय, रोहतक, हरियाणा रेनू मित्तल

टीजीटी (विज्ञान)

एयरफोर्स गोल्डन जुबिली संस्थान सुब्रोतो पार्क, दिल्‍ली छावनी

. रोमा मलिक

टीजीटी (विज्ञान) केन्द्रीय विद्यालय जे.एन.यू. कैम्पस न्यू महरोली रोड, मई दिल्ली

॥4.

43.

आर एस. चित्तोड़िया

टीजीटी (विज्ञान)

क्षेत्रीय शिक्षण संस्थान अजमेर राजस्थान

. एस. बालासुब्रमण्यन्‌

सहायक हेडमास्टर

सर्वजन हायर सेकेण्डरी स्कूल पीलामेडु, कोयम्बतूर

तमिलनाडु

डा. एस.सी, अगरकर

रिसर्च साइन्टिस्ट

होमी भाभा सेंटर फॉर साइंस एजूकेशन टीआईएफआर, मनचखुर्द

मुंबई

. एस.एस. सेंगर

पीजीटी (रसायन शास्त्र) जवाहर नवोदय विद्यालय भोगांव, मैनपुरी

उत्तर प्रदेश

, विजय राय

टीजीटी (जीव विज्ञान) केन्द्रीय विद्यालय पुष्प विहार, नई दिल्‍ली

एनसीईआरटी - डीईएसएम संकाय

4.

2 3. 4

शा

छत |. ऊा 80

प्रोफेसर जयश्री शर्मा

.. प्रोफेसर जे.एस. गिल

प्रोफेसर एम.पी. सिन्हा राजेन्द्र जोशी प्रोफेसर एस.सी. जैन प्रोफेसर वी.,जी. जाधव.

* प्रोफेसर वी.एन.पी. श्रीवास्तव डा, के.एम, पंत (समन्वयक)

विषय-सूची

प्राक्कथन आमुख

अध्याय १4

हमारी पृथ्वी

अध्याय 2

हमारा पर्यावरण

अध्याय 3

पदार्थ की प्रकृति

अध्याय 4

पदार्थों का पृथक्करण अध्याय 5

हमारे चारों ओर के परिवर्तन

अध्याय 6 सापन

अध्याय 7

सजीवों के अभिलक्षण एवम्‌ उनका वर्गीकरण अध्याय 8

सजीवों की संरचना तथा कार्य

अध्याय 9

बल और गति

अध्याय 40 कार्य तथा ऊर्जा

अध्याय १4 स्वास्थ्य एवम्‌ स्वास्थ्य विज्ञान

॥हह।

45

29

45

6॥

72

92

* ३40

॥27

439

52

का संविधान

उद्देशिका

हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य] बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को : सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना को स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समत्ता

: प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और “राष्ट्र की एकता और अखंडता] सुनिश्चित करने वाली बंधुता

बढ़ाने के लिए हि दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 949 ई0 को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं। !. संविधान (बयालीसवां संशोधम) अधिनियम, 976 की धारा 2 द्वारा (3..977 से) "प्रभुत्व-संपन्न लोकतंत्रात्मक

गणराज्य" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

2. संविधान (बयालीसबां संशोधन) अधिनियम, 976 की धारा 2 द्वारा (3..977) से "राष्ट्र कौ एकता" के _ स्थान पर प्रेतिस्थापित।

भाग 4 मूल कर्तव्य

5]क., मूल कर्तव्य - भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि चह ; (के) संविधान का पालन करे और उसके आदरशाौ, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्र गान का आदर करे; (ख) स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे; (गं) भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे; (घ) देश की रक्षा करे और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे; (डे) भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करें जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हैं (च) हमारी सामासिक संस्कृति को गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परिरक्षण करे; (छ) प्राकृतिक पर्यावरण की जिसके अंतर्गत बन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करे और उसका संवर्धन करे _तथा प्राणि मात्र के प्रति दयाभाव रखे; ' (ज) वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का बिकास करे; (झ) सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे और हिसा से दूर रहे; (ज) व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष कौ ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊंचाइयों की ले।

पृथ्वी पर रहते हैं। पृथ्वी पर मैदान, मरूस्थल ह्‌ (ैगिस्तान), पहाड़, नदियाँ, झीलें और महासागर हैं। पृथ्वी के बारे में हमें और क्या ज्ञात है ?

पिछली कक्षाओं में हम सीख चुके हैं कि पृथ्वी गेंद की भांति गोल है। पृथ्वी बहुत बड़ी है इसीलिये हम केवल इसके बहुत छोटे भाग को ही देख पाते हैं। यह भाग हमें लगभग चपटा दिखाई देंता है। पूरी पृथ्वी को एक साथ देखने के लिये हमें इससे बहुत दूर जाना पड़ेगा। अन्तरिक्ष यान में यात्रा करते समय अन्तरिक्ष यात्रियों ने पृथ्वी को अत्यंत दूरी से देखा है। उन्होंने अन्तरिक्ष से पृथ्वी के चित्र भी खींचे बाबा हैं। इन चित्रों को देखने से स्पष्ट ॥। हो जाता है कि पृथ्वी आकार में गोल (गोलाकार) है (चित्र 4.4)। चन्द्रमा से देखने पर पृथ्वी आकाश | में घूमते हुए एक गोले की भांति | दिखाई देती है। यह ठीक ऐसे ही जैसे हमें पृथ्वी से चन्द्रमा दिखाई देता है।

पृथ्वी स्थिर नहीं है। यह आकाश £ में लगातार गतिशील है यद्यपि हम इस गति को देख नहीं पाते। इसका ' कारण हमारे आस-पास की प्रत्येक वस्तु का पृथ्वी के साथ गतिशील होना है।

पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक निश्चित पथ पर गति करती है। यह पथ लगभग वृत्ताकार है। इस पथ को पृथ्वी की कक्षा कहते हैं (चित्र 4.2)। सूर्य के चारों ओर अपने अक्ष में गति करने के साथ-साथ पृथ्वी एक काल्पनिक अक्ष के सापेक्ष घूर्णणन भी करती है। इस घूर्णन के कारण ही पृथ्वी के विभिन्‍न भाग बारी- बारी से सूर्य के सामने आते हैं। आपको ज्ञात है कि दिन-रात पृथ्वी की इसी घूर्णन गति के कारण होते हैं।

चित्र 4.4 आकाश से प॒थ्वी का दृश्य

अध्याय

( कक शी कट कमाया का हे रा | ॥22202222/8004200/07%008222000 0:60 22220032/222232/2// 29208 2005,/222%/202224/2:23020/:672//077:4: की) 5 है 22200 /200020%

आकाश में दिखाई देने वाले विभिन्‍न पिंडों को आकाशीय पिंड कहते हैं। आकाशीय पिंडों के अध्ययन के विज्ञान को खगोलशास्त्र कहते हैं। खगोलशास्त्र का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों को खगोलशास्त्री कहते हैं। भारतवर्ष में खगोलशास्त्र का अध्ययन बहुत प्राचीन काल से ही किया जाता रहा है। आर्यभट््‌ट और भास्कर प्राचीन भारत के प्रसिद्ध खगोलशास्त्री थे। उन्होंने विभिन्‍न आकाशीय पिंडों के बारे में अनेक खोजें कीं। आर्यभट्ट ने लगभग 4500 वर्ष पूर्व पांचवीं शताब्दी में ही यह बता दिया था कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है जिसके कारण दिन-रात होते हैं। विश्व के अन्य भागों के लोगों को इस तथ्य की जानकारी सत्रहवीं शताब्दी में ही हो पाई।

हम जानते हैं कि पृथ्वी का एक बड़ा भाग जल से ढका है। इसमें से अधिकांश जल महासागरों में भरा है। बहुत से जीव-जन्तु तथा पौधे जल में रहते हैं। हम लोग थल पर रहते हैं। बहुत से अन्य जीव-जन्तु तथा पौधे भी थल पर रहते हैं। पक्षी तथा कुछ कीट उड़ सकते हैं। लेकिन वास्तव में वे भी थल्न पर ही रहते हैं। पृथ्वी पर किसी भी स्थान पर पाए. जाने वाले पौधों तथा जन्तुओं को सजीव कहते हैं। सभी सजीवों में कुछ गुण समान होते हैं। इनमें से प्रत्येक को भोजन की आवश्यकता होती है। सभी सजीव जनन करते हैं, उनमें वृद्धि होती है और अन्ततः मर जाते हैं। यह ठीक उसी प्रकार है जैसा प्रत्येक

मनुष्य के जीवन काल में होता है| सभी सजीव एक

साथ मिलकर सजीव जगत बनाते हैं।

हम जानते हैं कि हमारी पृथ्वी की भांति कुछ दूसरे पिंड भी सूर्य की परिक्रमा करते हैं। इन्हें ग्रह कहते हैं।

इनके अतिरिक्त रात्रि के आकाश में हम अनगिनत तारे देखते हैं। इनमें से कुछ तारे इतनी दूर हैं कि हम इन्हें देख भी नहीं पातें। आपके मन में कभी कभी यह प्रश्न अवश्य उठता होगा कि क्या इनमें से किसी तारे में हमारे जैसे मानव या किसी और रूप में जीवन है या नहीं। इस अध्याय में हम पृथ्वी के बारे में कुछ विस्तार से अध्ययन करेंगे। यह हमारा सबसे अधिक जाना पहचाना ग्रह है। हम उन परिस्थितियों का भी अध्ययन करेंगे जिनके कारण पृथ्वी में जीवन को बनाए रखना / दक्षिणी ध्रुव संभव हुआ। हम यह भी जानेंगे कि चित्र 4.2 सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की कक्षा क्या किसी अन्य आकाशीय पिंड में प्रति ययण.ण।थ।यए जश्ग्ग्ण किसी रूप में जीवन है या नहीं। आर्यभट्‌ट

यदि जीवन नहीं है तो इसका क्‍या

कारण है ? आर्यगट्ट प्राचीन भारत के एक महान वैज्ञानिक थे। उनका जन्म सन्‌ 478 कम इसयी में बिहार के पाटलीपुत्र (आजकल पटना) में हुआ था। उनके परिवार तथा

4.4 जीवन के लिए आवश्यक | उनकी शिक्षा और जीवन के बारे में वहुत कम जानकारी उपलब्ध है। बह एक शर्ते खगोलशास्त्री तथा प्राचीन काल के गणितज्ञ थे। आर्यभट्ट, बीजगणित का

| उपयोग करने वाले प्रथण गणितज्ञों में से एक हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि हमें आर्यमट्‌ट ने गणित तथा खगोलशास्त्र का पठन-पाठन किया। उन्होंने गणि जीवित रहने के लिए किन-किन चीजों | दशा आक्राशीय पिंडों की गति के बारे में अनेक अनुसंधान किए। उन्होंने गणित की आवश्यकता होती है? भोजन | वीजगणित तथा ब्रिकोणमिति के अनेक नियमों का प्रतिषादन किया। ज्याभिति जीवन की एक मूल आवश्यकता है। में उन्होंने अनेक नए प्रक्षण किए। उन्होंने पाई (0 का मान दशमलव में चार यदि हमें भोजन मिले तो हमारी | अंकों तक यथार्थता से चिकाला [6 5 3.444)| आरयभट्ट के समग यह माना जाता था कि सूर्य, तारे तथा अन्य आकाशीय पिंड पश्ची की परिक्रमा करते हैं। आर्यगट॒ट ने सर्वप्रथम यह बताया कि हमें 3. दिखाई देने वाली आकाशीब पिंडों की यह गति पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूमने के किरण है| उन्होंने यह भी प्रतिगादित किया कि चन्द्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण फाणः गश्यों तथा चना का छाया के कारण होते

जअममटुट "ने आयधटीग चथा आर्यगटट जिज्ञान्त नामक दो महत्वपूर्ण पुस्तकें

हिखी। पुरुक आसंकरीय में जागैषदुट ने 499 श्लीकों के माशणम से तर सम

जात गगित के सिद्धान्तों को संक्षेप ग॑ जिखा। पुस्तक आर्यगट्‌ट' सिक्षाच्त में

परगीलणारत रामन्धी विग-प्रतिविन काम में आने वाली गणनाएं की गई थीं।

गये कुछ गणनाएं जा" भी पंचांग दैयार करने में काम आती हैं। आर्यभदृट

: मृत्यु रानू 550 ईसयी में छुई। उप्रैल १975 में छोड़े गए प्रथम भारतीय परयोगिक उपग्रह का नाम उनके राम्मान में आर्थमंट्ट रखा गया।

प्रथम भारतीय उपग्रह आर्यभट्ट

- अनिल अनिल नल जब +++ ++-्ज-न--++>न+-----« 2

07 5 ४7 विज्ञान एवम्‌ प्रौद्योगिकी

मृत्यु हो जाएगी। अपने भोजन के लिए सभी सामग्री हमें पौधों तथा जन्तुओं से मिलती है। यह बात अन्य जन्तुओं के लिए भी सत्य है। जीवित रहने के लिए हमें जल की भी आवश्यकता होती है। सभी पौधों और जन्तुओं को भी जीवित रहने के लिए जल चाहिए।

अधिकांश पौधे अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। भोजन बनाने के लिए पौधों को कुछ पदार्थों तथा जल की आवश्यकता होती है। ये पदार्थ उन्हें मिट्टी से प्राप्त होते हैं। अपना भोजन बनाने के लिए पौधे सूर्य के प्रकाश तथा वायु में उपस्थित कार्बन डाईऑक्साइड का इस्तेमाल करते हैं। इस प्रकार पौधे मिट॒टी, जल, कार्बन डाईऑक्साइड तथा सूर्य के प्रकाश के बिना अपना भोजन नहीं बना सकते।

भोजन तथा जल सभी जीवों के लिए आवश्यक हैं। हम साँस लिए बिना कुछ मिनट भी जीवित नहीं रह सकते। जीवित रहने के लिए हमारे शरीर को ऑक्सीजन चाहिए। यह हमें उस वायु से मिलती है जो हम साँस द्वारा लेते हैं। यह अन्य जन्तुओं के लिए भी आवश्यक है। वह भी ऑक्सीजन वायु से प्राप्त करते हैं। जल में रहने वाले जन्तुओं, जैसे मछली को भी ऑक्सीजन चाहिए। वह इसे जल में घुली ऑक्सीजन से प्राप्त करते हैं। क्रियाकलाप 4 किसी बीकर (250 .) या छोटे बर्तन में कुछ जल लीजिए। इसे बर्नर या मोमबत्ती की ज्वाला पर धीरे-धीरे गर्म कीजिए। जब बर्तन में जल थोड़ा गर्म हो जाए तो इसे ध्यानपूर्वक देखिए। क्या आपको बर्तन की अन्दर की दीवारों पर कुछ बुलबुले दिखाई देते हैं ? ये बुलबुले जल में घुली वायु के हैं।

पौधों को भी श्वसन के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। वायु अथवा ऑक्सीजन जीवन के लिए एक और आवश्यकता है।

इस प्रकार हमने देखा कि पृथ्वी पर जीवन के लिए वायु, जल, मिट्टी तथा सूर्य का प्रकाश आवश्यक हैं। आइए, इनके बारे में कुछ विस्तार से अध्ययन करें।

एमाश पृण्चे |

4.2 पृथ्वी की संरचना

पृथ्वी की सतह का अध्ययन करने पर यह देखा गया कि यह रबड़ की किसी गेंद के समान चिकनी नहीं है। पृथ्वी के कुछ स्थानों पर सतह समतल है। कुछ स्थानों पर घाटियाँ हैं। पृथ्वी पर हिमालय जैसे पर्वत हैं। इसके बहुत से क्षेत्र मरूस्थल हैं, जैसे राजस्थान में थार मरूस्थल। ऊँचे-ऊँचे पहाड़, गहरी घाटियाँ और समतल मैदान मिलकर भू-आकृति बनाते हैं। भू-आकृतियों के मध्य अनेकों नदियाँ, झरने, झीलें और तालाब फैले हुए हैं। भू-आकृति की भूमि के विशाल क्षेत्रों को सागर और महासागर अलग करते हैं। इस प्रकार हमारी पृथ्वी की सतह समतल और चिकनी नहीं है। यह कहीं पर ऊँची है और कहीं पर नीची।

पृथ्वी पर ऊँचे और नीचे भागों के होते हुए भी हम उसे गोलाकार क्यों कहते हैं ? ऐसा हम इसलिए कहते हैं क्योंकि पृथ्वी का साइज़ बहुत बड़ा है। पृथ्वी की सतह पर ऊँचे और नीचे भाग इसके साइज़ की तुलना में बहुत छोटे हैं। यह बिलकुल चन्द्रमा की भांति है जिसकी सतह पर बड़े-बड़े क्रेटर (गड़ढे) और अनेक छोटे-बड़े पहाड़ हैं फिर भी यह हमें गोलाकार दिखाई देता है (चित्र 4.3)।

हमने देखा कि पृथ्वी की सतह समतल नहीं है। यह अन्दर से कैसी है ? क्‍या यह लोहे की किसी गेंद के समान ठोस है ? अथवा रबड़ की किसी गेंद की भांति खोखली है?

वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के आन्तरिक भाग का अध्ययन . किया है। उन्होंने पृथ्वी के आन्तरिक भाग का एक

क्रेटर

चित्र 4.3 चन्द्रमा की सतह ऊबड़-खाबड़ है फिर भी यह हमें गोलाकार दिखाई देता है

मॉडल तैयार किया है जो आकार में किसी सेब के आन्तरिक भाग के सदृश्य है (चित्र 4.4 (9)। इस मॉडल के अनुसार पृथ्वी के आन्तरिक भाग को तीन प्रमुख परतों में विभाजित किया जा सकता है। ये परतें भूपर्पटी, प्रावार तथा क्रोड कहलाती हैं (चित्र 4.4 (9)|

(०)

चित्र 4.4 (७) एथ्वी का आंतरिक भाग किसी सेब के आंतरिक भाग के सदृश्य है (9) पृथ्वी की तीन प्रमुख परतें

. भूपर्पटी

पृथ्वी की सबसे बाहरी परत अन्य दो परतों की अपेक्षा बहुत पतली है। पृथ्वी की यह परत भूपर्पटी कहलाती है। भूपर्पटी की मोटाई लगभग 35 से 60 किलोमीटर तक है। महासागरों के नीचे यह पतली होती है। पृथ्वी का अर्धव्यास लगभग 6400 किलोमीटर है। इस प्रकार पृथ्वी का अर्धव्यास भूपर्पटी की मोटाई से लगभग 400 गुणा अधिक है।

हम प्रथ्वी के साइज़ और इसकी भूपर्पटी की मोठाई की तुलना सेब और उसके छिलके से कर सकते हैं। यदि हम पृथ्वी को एक बड़े सेब के साइज़ का मान लें तो इसकी भूपर्पटी की मोटाई इसके छिलके के समान होगी।

पृथ्वी की सतह पर दिखाई देने वाले ऊँचे या नीचे स्थान, भूपर्पटी की तुलना में भी बहुत छोटे हैं। उदाहरण के लिये एवरेस्ट पर्वत की सबसे ऊँची चोटी की ऊँचाई लगभग 8.8 किलोमीटर है। अब आप समझ सकते हैं कि हम पृथ्वी को गोलाकार क्‍यों मानते हैं।

भूपर्पटी मानव के साथ-साथ सभी जीवों के लिए महत्वपूर्ण है। इसका कारण है कि इससे हमें वह सभी आवश्यक पदार्थ मिलते हैं जो जीवन-यापन तथा वृद्धि

के लिए आवश्यक हैं। भूपर्पटी में यह सभी पदार्थ विभिन्‍न रूपों में मिलते हैं जैसे वायु, जल, चट्टान और मिट्ठी। भूपर्पटी में पाए जाने वाले अनेक पदार्थ खनिज कहलाते हैं। साधारण नमक, चूना पत्थर, कोयला, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस इन खनिजों के कुछ सामान्य उदाहरण हैं। वास्तव में सजीवों के लिए आवश्यक अधिकांश पदार्थ मिट॒टी तथा जल में पाए जाने वाले खनिजों से प्राप्त होते हैं।

मनुष्य ने अपनी सुविधा तथा आराम के लिए और भी बहुत से पदार्थों का उपयोग करना सीख लिया है। यह पदार्थ भूपर्पटी में पाए जाने वाले विभिन्‍न प्रकार के खनिजों से प्राप्त होते हैं। इनमें से बहुत से खनिज पृथ्वी की सतह के नीचे बहुत अधिक गहराई में पाए जाते हैं। कोयला, पेट्रोल, डीजल, खाना पकाने की गैस, रत्न तथा लोहा, तांबा, ऐलुमिनियम और सोना जैसी धातुएं कुछ ऐसे पदार्थों के उदाहरण हैं जो खनिजों से प्राप्त होते हैं। भूषर्पटी में पाए जाने वाले पदार्थों तथा खनिजों का हमारे जीवन में अत्यन्त महत्व है। इस सम्बन्ध में हम विस्तार से आगे पढेंगे।

प्रावार तथा क्रोड

भूपर्पटी की तली से लगभग 2900 किलो- मीटर की गहराई तक पृथ्वी की दूसरी परत है। पृथ्वी की इस परत को प्रावार कहते हैं। यह पृथ्वी की मध्य परत है। अभी तक हमें प्रावार के बारे में बहुत अधिक जानकाशी नहीं है| पृथ्वी की यह परत इसकी सतह से बहुत अधिक गरम है। यह विश्वास किया जाता है कि इसमें मुख्य रूप से पिघली या ठोस अवस्था में चट्टानें हैं।

इनके उत्तर दीजिए

. उन पदार्थों की सूची बनाइए जिन्हें आप दिनभर में खाते हैं। उन पौधों और जन्तुओं के नाम लिखिए जिनसे यह पदार्थ प्राप्त होते हैं|

, उन पदार्थों के नाम लिखिए जो पृथ्वी पर जीवन की

उपस्थिति के लिए आवश्यक हैं।

3. पृथ्वी की तीन परतों के नाम बताइए।

. पृथ्वी की किस परत में पेट्रोलियम मिलने की संभावना होती है?

. पृथ्वी की किस परत में खनिज पाए जाते हैं?

विज्ञान एवग्‌ प्रौद्योगिकी

इन पिघली हुई चट्टानों में बहुत सी गैसें भी विद्यमान हैं। यह गर्म पिघली हुई चट्टानें और गैसें मैग्मा कहलाती हैं।

पृथ्वी के सबसे अन्दर के भाग को क्रोड कहते हैं| यह पृथ्वी का सबसे गर्म भाग है। क्रोड में मुख्य रूप से लोहा है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि पृथ्वी के केन्द्र के पास लोहा ठोस रूप में विद्यमान है। क्रोड के बाहरी भाग में अधिकतर पिघला हुआ लोहा विद्यमान है।

4.3 वायुमंडल हम जानते हैं कि पृथ्वी की सतह के चारों ओर वायु है। इसे वायुमंडल कहते हैं। इसमें ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, आर्गान तथा कार्बन डाईऑक्साइड तथा कुछ अन्य गैसें होती हैं। पौधे तथा अन्य जन्तु ऑक्सीजन के बिना जीवित नहीं रह सकते। पौधों को अपना भोजन बनाने के लिए कार्बन डाईऑक्साइड की भी आवश्यकता होती है। वायुमंडल की मोटाई, पृथ्वी के साइज़ की तुलना में बहुत कम है। यद्यपि वायुमंडल पृथ्वी की सतह से कई किलोमीटर ऊपर तक फैला है परन्तु इसमें उपस्थित वायु का 99% लगभग 30 किलोमीटर की ऊँचाई तक पाया जाता है। वायु में मुख्यतः ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन गैस पाई जाती हैं। वास्तव में ये दोनों गैसें मिलकर वायु का लगभग 99% भाग बनाती हैं। शेष 4% भाग में

कार्बन डाईऑक्साइड, जल-वाष्प, आर्गान, सल्फर,

अन्य गैसें; आर्गान, कार्बन डाईऑक्साइड तथा जल वाष्प

बे ऑक्सीजन

नाइट्रोजन

चित्र 4.5 वायु में विद्यमान मुख्य गैसों का अनुपात

85 ७५ गण सेफ है हे

डाईऑक्साइड तथा अन्य गैसें पाई जाती हैं (चित्र 4.5) |

आइए, एक क्रियाकलाप द्वारा वायु में विद्यमान ऑक्सीजन के अनुपात को ज्ञात करें। क्रियाकलाप 2

किसी द्रोणिका (ट्रफ) या किनारे वाली थाली के मध्य में लगभग 5 ०८० लम्बी एक मोमबत्ती लगाइए। थाली में इतना पानी भरिए कि मोमबत्ती पानी के तल के ऊपर रहे। मोमबत्ती को जलाइए और इसे कॉच के एक गिलास से ढक दीजिए (चित्र 4.6)।

ध्यानपूर्वक देखिए कि क्या होता है। कुछ ही क्षणों में मोमबत्ती क्‍यों बुझ जाती है ? क्या आप बता सकते हैं कि गिलास में पानी ऊपर क्‍यों चढ़ जाता है ?

चित्र 4.6 वायु में ऑक्सीजन पाई जाती है

मोमबत्ती को जलने के लिए ऑक्सीजन चाहिए। पानी के ऊपर ढके हुये गिलास की वायु में ऑक्सीजन है। प्रारम्भ में गिलास के अन्दर की वायु की यही ऑक्सीजन मोमबत्ती को जलाए रखती है। जब अधिकांश ऑक्सीजन जलने में उपयोग हो जाती है तो मोमबत्ती बुझ जाती है। ऑक्सीजन द्वारा खाली किये गये स्थान को भरने के लिये पानी गिलास में चढ़ जाता है। इस क्रियाकलाप से वायु में ऑक्सीजन की उपस्थिति का पत्ता चलता है।

ऑक्सीजन केवल जलने में ही सहायता नहीं करती, यह जीवित रहने के लिये भी आवश्यक है। जैसे-जैसे हम पृथ्वी की सतह से ऊपर जाते हैं वायु की मात्रा कम होती जाती है। यही कारण है कि पर्वतारोही अपने साथ ऑक्सीजन का सिलेन्डर साथ ले जाते हैं।

हमने देखा कि ऑक्सीजन जलने में सहायक है। नाइट्रोजन तो जलने में सहायता करती है और स्वयं ही जलती है। लेकिन फिर भी वायु में नाइट्रोजन का अधिक प्रतिशत हमारे लिए वरदान है। यह पदार्थों के जलने की दर को धीमा कर देती है। इस प्रकार, वायु की नाइट्रोजन, जलने के प्रक्रम को नियंत्रण में रखती है। आजकल्र हमें नाइट्रोजन के बहुत से अन्य उपयोग ज्ञात हैं। यह बड़े पैमाने पर कृषि में इस्तेमाल होने वाले उर्वरक बनाने के काम आती है।

वायुमंडल हमारे लिए और भी अनेक प्रकार से लाभदायक है। सूर्य से आने वाला प्रकाश और ऊष्मा सबसे पहले वायुमंडल की ऊपरी सतह से टकराते हैं। वायुमंडल इनके केवत्न कुछ भाग को ही पृथ्वी की सतह तक पहुंचने देता है। बाकी भाग या तो. वायुमंडल द्वारा परावर्तित कर दिया जाता है या अवशोषित कर लिया जाता है। ऊपरी सतह पर पड़ने वाले इस प्रकाश और ऊष्मा में जीवन के लिए हानिकारक कुछ घटक भी होते हैं। वायुमंडल इनमें से भी अधिकांश को या त्तो वापस भेज देता है या अवशोषित कर लेता है। इस

भू-तत्ञ द्वारा परावर्तित

भू-तल हारा अवशोदित चित्र 4.7 वायुमंडल ह्ञाय ऊपरी सतह पर

पड़ने वाले प्रकाश तथा ऊष्मा का परावर्तन एवं अवशोषण

प्रकार ये हानिकारक घटक पृथ्वी की सतह तक नहीं पहुंच पाते (चित्र 4.7)।

यदि वायुमंडल होता तो पृथ्वी की सतह बहुत अधिक गर्म हो जाती। वायुमंडल के कारण ही पृथ्वी की सतह अधिक गर्म है और ही अधिक उंडी। इसके कारण ही पृथ्वी पर जीवन-यापन सम्भव है।

इस प्रकार वायुमंडल पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करने में किसी कम्बल की तरह आवरण का कार्य करता है।

प्रकृति में निरंतर घटने वाले अनेक प्रक्रमों में वायुमंडल

- महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उदाहरण के लिए, पृथ्वी

की सतह पर विभिन्‍न स्थानों पर पहुंचने वाली ऊष्मा तथा प्रकाश की मात्रा पूरे वर्ष बदलती रहती है। किसी एक स्थान पर भी यह प्रतिदिन और दिन के विभिन्‍न समयों में भी बदलती है। इसके परिणामस्वरूप पृथ्वी का कोई एक स्थान किसी अन्य स्थान की अपेक्षा अधिक गर्म हो जाता है। सतह के सम्पर्क में आने वाली वायु भी इसी के अनुसार गर्म या ठंडी हो जाती है। ताप के इस अन्तर के कारण वायु एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर बहती है। पवन का बहना एवं तूफान तथा

झंझावत का बनना, वायु

बादल, धूल तथा की इसी गति के कारण करू द्वास परावर्तित सम्भव हो पाता है।

एक और अन्य प्रक्रम

में वायुमंडल की भूमिका

महत्वपूर्ण है। आपने देखा

होगा कि गीला फर्श कुछ समय के पश्चात्‌ सूख जाता है। यह जल कहां चला जाता है ? जल का एक भाग जलवाष्प में बदल जाता है। जल के वाष्प में बदलने के प्रक्रम को वाष्पन कहते हैं। महासागरों, नदियों तथा जल के अन्य स्रोतों जैसे झीलों तथा तालाबों से जल का लगातार

विज्ञान एयम्‌ प्रौद्योगिकी

वाष्पन होता रहता है। यह जल-वाष्प वायुमंडल का ही एक भाग बन जाती है। आइए, वायु में विद्यमान जल- वाष्प को एक क्रियाकलाप द्वारा देखें। क्रियाकलाप 3 किसी गिलास में बर्फ के कुछ टुकड़े डालिए। कुछ मिनट प्रतीक्षा कीजिए। गिलास की बाहरी सतह का ध्यानपूर्वक निरीक्षण कीजिए। गिलास की बाहरी दीवार पर पानी की कुछ बूंदें दिखाई देंगी। यह बूंदें कहां से आईं ?

वायु में जल-वाष्प विद्यमान है। गिलास की ठंडी सतह के सम्पर्क में आकर वायु ठंडी हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप कुछ जल-वाष्प पानी की छोटी- छोटी बूँदों में बदल जाती है। इनमें से कुछ बूंदें गिलास की बाहरी दीवार से चिपक जाती हैं। जब कभी भी आप किसी ठंडे पानी के गिलास या किसी शीतल पेय की बोतल को लें, तब भी आप ऐसा देख सकते हैं। किसी साफ कपड़े से गिलास या बोतल की बाहरी सतह को पोंछिए। कुछ मिनट प्रतीक्षा कीजिए। आप क्या देखते हैं ?

वायु में विद्यमान जल-वाष्प पवन के साथ विभिन्‍न स्थानों पर पहुंच जाती है। किसी निश्चित ऊँचाई पर पहुंचकर यह जल-वाष्प ठंडी हो जाती है और पानी की छोटी-छोटी बूंदों में बदल जाती है। पानी की यह बूंदें ही हमें बादलों के रूप में दिखाई देती हैं। अंत में पानी की बूंदें वर्षा या बर्फ के रूप में धरती पर गिर जाती हैं (चित्र 4.8)| इस प्रकार जल के एक अवस्था से दूसरी अवस्था में बदलने तथा फिर से जल में परिवर्तित होने के प्रक्रम को जल-चक्र कहते हैं।

.... बादल

इस प्रकार वायुमंडल “+ . सभी जीवों को निरंतर जल... उपलब्ध कराता है। हमारे

धमाश पश्गी

दैनिक जीवन के लिए

रे उत्तर दीजिए आवश्यक जल की 4. वायु में पाई जाने वाली दो | आपूर्ति भी इसी जल-

मुख्य गैसों क॑ नाम लिखिए। 2. किसी स्वच्छ कांच की प्लेट पर अपने मुंह से साँस छोड़िए। कांच की प्लेट कुछ देर तक धुंधली क्‍यों दिखाई देती है ? संक्षेप में व्याख्या कीजिए। 3. जब गीले कपड़े सूखते हैं तो पानी का क्‍या होता है ?

चक्र द्वारा होती है। वायु में उपस्थित जल-वाष्प हमारे परिस्थान (आस- पास) को शीतलता प्रदान करती है।

4.4 महासागर पृथ्वी की सतह का लगभग दो तिहाई भाग जल से ढका है। पृथ्वी के जल का अधिकांश भाग समुद्रों या महासागरों में भरा हुआ है। ये महासागर पृथ्वी की अधिकांश सतह को घेरे हुये हैं। उत्तरी तथा . दक्षिणी ध्रुव के पास महासागरों का जल हिम के रूप में है।

महासागरों का पृथ्वी पर विद्यमान जीवन को बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण योगदान है। हम पहले ही सीख चुके हैं कि किस प्रकार महासागरों से जल के लगातार वाष्पन के कारण वर्षा और हिमपात होता है। महासागर, पृथ्वी की सतह पर पहुंचने वाली सूर्य की ऊष्मा को अवशोषित कर लेते हैं। इसी में से कुछ ऊष्मा इनकी

चित्र 4,9 जलीय जीवन सतह से जल को वाष्पित करने में उपयोग में आती है। महासागर विभिन्‍न लाभदायक पदार्थों के भंडार हैं। इनमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण साधारण नमक तथा आयोडीन हैं। महासागर विभिन्‍न प्रकार के पौधों तथा जन्तुओं के रहने के लिए उचित पर्यावरण उपलब्ध कराते हैं। महासागर में रहने वाले विभिन्‍न प्रकार के सजीवों को सम्मिलित रूप में जलीय जीवन के नाम से जाना जाता है (चित्र 4.9)| जलीय जीवन में स्थल पर विद्यमान जीवन के समान ही विविधता है। महासागर में पाए जाने वाले कुछ जीव इतने छोटे हैं कि इन्हें हम अपनी आँखों से नहीं देख सकते। कुछ दूसरे जीव व्हेल जैसे विशाल हैं। मछली तथा कुछ अन्य

जलीय जन्तु तथा पौधे भोजन के रूप में उपयोग किए .

जाते हैं। ].5 जल

हम जानते हैं कि जल सभी सजीवों के लिये आवश्यक है। सभी पौधों तथा जन्तुओं के शरीर में जल होता है। हमारे शरीर का लगभग 70% भार जल के कारण है। सजीवों में अनेक प्रक्रमों को संपन्‍न करने में जल की एक महत्वपूर्ण भूमिका है। जल का महत्व इसके अनेक विशिष्ट गुणों के कारण है। आइए, इनमें से कुछ गुणों का अध्ययन करें|

जल में अनेक पदार्थ घुल जाते हैं। मिट्टी में पाए -

जाने वाले अनेक खनिजों को यह घोल सकता है। पानी में घुले इन खनिज लवणों को पौधों की जड़ें जल के साथ अवशोषित कर लेती हैं। ये खनिज पौधों को उनका भोजन बनाने में सहायता करते हैं। पौधों को

यदि कुछ समय तंक जल मिले तो वह मर जाएंगे। पानी में घुली ऑक्सीजन का जलीय जीवन द्वारा उपयोग किया जाता है।

जल का एक अन्य गुण है कि यह ठोसों या अन्य _ द्रंवों की अपेक्षा धीमे-धीमे गर्म होता है और धीमे-धीमे ही ठंडा होता है। यह गुण जल को गर्मियों में अधिक गर्म और जाड़ों में अधिक ठंडा नहीं होने देता। इस प्रकार मछलियाँ. और दूसरे जीव जन्तु बहुत अधिक गर्मी या सर्दी में भी नदियों, झीलों और महासागरों में. आसानी से जीवित रह सकते हैं।

: - समुद्री तटों के पास समुद्र समीर के बहने का कारण

भी जल का धीमे-धीमे गर्म होना या ठंडा होना ही है। जमीन, पानी की अपेक्षा जल्दी ही गर्म होती है और जल्दी ही ठंडी होती है। समुद्री तट पर दोपहर तक जमीन समुद्र के पानी की अपेक्षा अधिक गर्म हो जाती है। इसके कारण पवन समुद्र से जमीन की ओर बहती है। रात्रि में जमीन पानी की अपेक्षा अधिक ठंडी हो जाती है इसलिए पवन जमीन से समुद्र की ओर. बहती है। इस पवन को समुद्र समीर कहते हैं। यही कारण है कि तटीय क्षेत्रों की जलवायु बहुत अधिक . नहीं बदलती।

जल का एक और विशेष गुण है। आप जानते हैं कि बर्फ जल पर तैरती है। बर्फ जल का ठोस रुप है। : इस प्रकार, जल का ठोस रूप इसके द्रव रूप पर , तैरता है।

आइए, देखें कि जल का यह गुण पृथ्वी पर जीवन : के लिए किस प्रकार लाभकारी है। पृथ्वी पर बहुत से क्षेत्र, जैसे उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुवों के निकटवर्ती क्षेत्र जाड़ों में बहुत अधिक ठंडे हो जाते हैं। इन क्षेत्रों